भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 290

२६४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * उनमें वर्णित विविध विज्ञानसम्बन्धी बातोंको समझनेवाले भी नहीं हैं। वेदोंका पाठ अर्थात् यथार्थ उच्चारण करनेकी विविका उपदेश 'शिक्षा' है। जिसमें यज्ञ-याग आदिकी विधि बतलायी गयी है, उसे 'कल्प' कहते हैं (गृह्यसूत्र आदिकी गणना कल्पमें ही है)। वैदिक और लौकिक शब्दोंके अनुशासनका-प्रकृति प्रत्यय विभागपूर्वक शब्द-साधनकी प्रक्रिया, शब्दार्थ- बोधके प्रकार एवं शब्दप्रयोग आदिके नियमोंके उपदेशका नाम 'व्याकरण' है। वैदिक शब्दोंका जो कोष है, जिसमें अमुक पद अमुक वस्तुका वाचक है-यह बात कारणसहित बतायी गयी है, उसको 'निरुक्त' कहते हैं। वैदिक छन्दों की जाति और भेद बतलानेवाली विद्या 'छन्द' कहलाती है। ग्रह और नक्षत्रोंकी स्थिति, गति और उनके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है-इन सब बातोंपर जिसमें विचार किया गया है, वह 'ज्योतिष' विद्या है। इस प्रकार चार वेद और छः वेदाङ्ग-इन सबका नाम अपरा विद्या है; और जिसके द्वारा परब्रह्म अविनाशी परमात्माका तत्त्वज्ञान होता है, वह परा विद्या है। उसका वर्णन भी वेदाम ही है, अतः उतने अंशको छोड़कर अन्य सब वेद और वेदाङ्गोंको अपरा विद्याके अन्तर्गत समझना चाहिये ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-ऊपर बतलायी हुई परा विद्याके द्वारा जिसका ज्ञान होता है, वह अविनाशी ब्रह्म कसा है-इस जिज्ञासापर कहते हैं- यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥ तत्=वह, यत्=जो, अद्रेश्यम्=जाननेमे न आनेवाला, अग्राह्यम्=पकड़नेम न आनेवाला, अगोत्रम्=गोत्र आदिसे रहित, अवर्णम्=रंग और आकृतिसे रहित; अचक्षुःश्रोत्रम्=नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंमे रहित (ओर) अपाणिपादम्= (और) हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंसे (भी) रहित है; [ तथा=तथा; ] तत्=वह यत्= जो, नित्यम्=नित्य; विभुम्= सर्वव्यापी, सर्वगतम्=सबमे फैला हुआ, सुसूक्ष्मम्=अत्यन्त सूक्ष्म (और), अव्ययम्=अविनाशी परब्रह्म है, तत्=उम; भूतयोनिम्=समस्त प्राणियोंके परम कारणको, धीराः=ज्ञानीजन, परिपश्यन्ति=सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है। सारांश यह है कि वे परब्रह्म परमेश्वर ज्ञानेन्द्रियोंद्वारा जाननेमें नहीं आते, न कर्मेन्द्रियोंद्वारा पकड़नेमे ही आते हैं। वे गोत्र आदि उपाधियोसे रहित, तथा ब्राह्मण आदि वर्णगतभेदसे एव रंग और आकृतिसे भी सर्वथा रहित हैं। वे नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंसे और हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियोंमे भी रहित है। तथा वे अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक, अन्तर्यामीरूपसे सबमें फैले हुए और कभी नाश न होनेवाले सर्वथा नित्य हैं। समस्त प्राणियोंके उन परम कारणको ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-वे जगदात्मा परमेश्वर समस्त भूतोंके परम कारण कैसे हैं, सम्पूर्ण जगत् उनसे किस प्रकार उत्पन्न होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं- यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति । यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥ यथा=जिस प्रकार; ऊर्णनाभिः=मकड़ी, सृजते=(जालेको) बनाती है, च=और; गृह्णते=निगल जाती है (तथा), यथा=जिस प्रकार, पृथिव्याम्=पृथ्वीमे, ओषधयः =नाना प्रकारकी ओषधियाँ, सम्भवन्ति=उत्पन्न होती ह ( और ), यथा=जिस प्रकार, सतः पुरुषात्=जीवित मनुष्यसे, केशलोमानि=केश और रोएँ (उत्पन्न होते हे); तथा=उमी प्रकार, अक्षरात्=अविनाशी परब्रह्मसे, इह=यहाँ-इस सृष्टिमे, विश्वम्=सब कुछ, सम्भवति=उत्पन्न होता है ॥ ७ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें तीन दृष्टान्तोंद्वारा यह बात समझायी गयी है कि परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड़-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्‌के निमित्त और उपादान कारण हैं। पहले मकड़ीके दृष्टान्तसे यह बात कही गयी है कि जिस प्रकार मकड़ी अपने पेटमे स्थित जालेको बाहर निकालकर फैलाती है और फिर उसे निगल जाती है, उसी प्रकार वह परब्रह्म परमेश्वर अपने अन्दर सूक्ष्मरूपसे लीन हुए जड-चेतनरूप जगत्‌को सृष्टिके आरम्भम नाना प्रकारसे उत्पन्न करके फैलाते ह और प्रलय- कालमें पुनः उसे अपनेमे लीन कर लेते हैं (गीता ९। ७-८) । दूसरे उदाहरणसे यह बात समझायी है कि जिस प्रकार