कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 295, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 295
- मुण्डकोपनिषद् * २६९ अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितं मन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥ अविद्यायाम् अन्तरे=अविद्याके भीतर, वर्तमानाः=स्थित होकर (भी), स्वयंधीराः=अपने-आप बुद्धिमान् बनने- वाले (और), पण्डितम् मन्यमानाः=अपनेको विद्वान् माननेवाले; मूढाः=वे मूर्खलोग; जङ्घन्यमानाः=बार-बार आघात (कष्ट) सहन करते हुए; परियन्ति=(ठीक वैसे ही) भटकते रहते हैं, यथा=जैसे, अन्धेन एव= अन्धेके द्वारा ही, नीयमानाः=चलाये जानेवाले, अन्धाः=अंधे (अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर बीचमें ही इधर-उधर भटकते और कष्ट भोगते रहते हैं) ॥ ८ ॥ व्याख्या—जब अन्धे मनुष्यको मार्ग दिखलानेवाला भी अन्धा ही मिल जाता है, तब जैसे वह अपने अभीष्ट स्थान- पर नहीं पहुँच पाता, बीचमे ही ठोकरें खाता भटकता है और काँटे-कंकड़ोंसे बिंधकर या गहरे गढ्ढे आदिमें गिरकर अथवा किसी चट्टान, दीवाल और पशु आदिसे टकराकर नाना प्रकारके कष्ट भोगता है, वैसे ही उस मूर्खको भी पशु, पक्षी, कीट पतग आदि विविध दु खपूर्ण योनियोंमें एव नरकादिमें प्रवेश करके अनन्त जन्मोंतक अनन्त यन्त्रणाओंका भोग करना पडता है, जो अपने-आपको ही बुद्धिमान् और विद्वान् समझता है, विद्या-बुद्धिके मिथ्याभिमानमे शास्त्र और महापुरुषोंके वचनोंकी कुछ भी परवा न करके उनकी अवहेलना करता और प्रत्यक्ष सुखरूप प्रतीत होनेवाले भोगोंको भोग करनेमें तथा उनके उपार्जनमे ही निरन्तर सलग्न रहकर मनुष्यजीवनका अमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करता रहता है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—वे लोग बारवार दुःखोंमें पडकर भी चेतते क्यों नहीं, कल्याणके लिये चेष्टा क्यों नहीं करते, इस जिज्ञासापर कहते हैं— अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः । यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥ बालाः=वे मूर्खलोग, अविद्यायाम्=उपासनारहित सकाम कर्मोंमें, बहुधा=बहुत प्रकारमे, वर्तमानाः=वर्तते हुए, वयम्=हम, कृतार्थाः=कृतार्थ हो गये, इति अभिमन्यन्ति=ऐसा अभिमान कर लेते हैं, यत्=क्योंकि, कर्मिणः=वे सकाम कर्म करनेवाले लोग, रागात्=विषयोंकी आसक्तिके कारण, न प्रवेदयन्ति=कल्याणके मार्गको नहीं जान पाते; तेन=इस कारण, आतुराः=बार-बार दुःखसे आतुर हो, क्षीणलोकाः=पुण्योपार्जित लोकोंसे हटाये जाकर, च्यवन्ते=नीचे गिर जाते हैं ॥ ९ ॥ व्याख्या—पूर्वमन्त्रमें कहे हुए प्रकारसे जो इस लोक और परलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये सासारिक उन्नतिके साधनरूप नाना प्रकारके सकाम कर्मोंमें ही बहुत प्रकारसे लगे रहते ह, वे अविद्यामें निमग्न अज्ञानी मनुष्य समझते हैं कि 'हमन अपन क र्तव्यका पालन कर लिया।' उन सासारिक कर्मामे लगे हुए मनुष्योंकी भोगोंमें अत्यन्त आसक्ति होती है, इस कारण वे सासारिक उन्नतिके सिवा कल्याणकी ओर दृष्टि ही नहीं डालते । उन्हें इस बातका पता ही नहीं रहता कि परमानन्दके समुद्र कोई परमात्मा हैं और मनुष्य उन्हें पा सकता है। इसलिये वे उन परमेश्वरकी प्राप्तिके लिये चेष्टा न करके बार-बार दुखी होते रहते हैं और पुण्यकमोंका फल पूरा होनेपर वे स्वर्गादि लोकोंसे नीचे गिर जाते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातको ही और भी स्पष्ट करते हैं— इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥१०॥ इष्टापूर्तम्=इष्ट और पूर्त* (सकाम) कर्मोंको ही, वरिष्ठम्=श्रेष्ठ, मन्यमानाः=माननेवाले, प्रमूढाः=अत्यन्त मूर्खलोग, अन्यत्=उससे भिन्न, श्रेयः=वास्तविक श्रेयको, न वेदयन्ते=नहीं जानते, ते=वे, सुकृते=पुण्यकर्मोंके
- यज्ञ-यागादि श्रौत कर्मोंको 'इष्ट' तथा बावली, कुआँ खुदवाना और बगाचे लगाना आदि स्मृनिविहित कर्मोंको 'पूर्त' कहते हैं।