भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 296

फलस्वरूप, नाकस्य पृष्ठे = स्वर्गके उच्चतम स्थानमे, अनुभूत्वा = ( जाकर श्रेष्ठ कर्मोंके फलस्वरूप ) वहाँके भोगोंका अनुभव करके, इमम् लोकम् = इस मनुष्यलोकमें, वा = अथवा, हीनतरम् = इससे भी अत्यन्त हीन योनियोंमे; विशन्ति = प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥ व्याख्या—वे अतिशय मूर्ख भोगासक्त मनुष्य इष्ट और पूर्तको अर्थात् वेद और स्मृति आदि शास्त्रोंमे सांसारिक सुखोंकी प्राप्तिके जितने भी साधन बताये गये हैं, उन्हींको सर्वश्रेष्ठ कल्याण-साधन मानते हैं । इसलिये उनसे भिन्न अर्थात् परमेश्वरका भजन, ध्यान और निष्कामभावसे कर्तव्यपालन करना एवं परमपुरुष परमात्माको जाननेके लिये तीव्र जिज्ञासापूर्वक चेष्टा करना आदि जितने भी परम कल्याणके साधन हैं, उन्हें वे नहीं जानते, उन कल्याण-साधनोंकी ओर लक्ष्य- तक नहीं करते । अतः वे अपने पुण्यकर्मोंके फलरूप स्वर्गलोकतकके सुखोंको भोगकर पुण्य क्षय होनेपर पुनः इस मनुष्यलोकमें अथवा इससे भी नीची शूकर कूकर, कीट पतङ्ग आदि योनियोमे या रौरवादि घोर नरकोंमे चले जाते हैं। (गीता ९। २० २१) ॥ १० ॥

सम्बन्ध—ऊपर बतलाये हुए सांसारिक भोगोंसे विरक्त मनुष्यकि आचार-व्यवहार और उनके फलका वर्णन करते हैं— तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः । सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११॥

हि = किन्तु, ये = जो, अरण्ये [स्थिताः]=वनमे रहनेवाले, शान्ताः = शान्त स्वभाववाले; विद्वांसः = विद्वान्, भैक्ष्यचर्याम् चरन्तः = तथा भिक्षाके लिये विचरनेवाले, तपःश्रद्धे = मयमरूप तप तथा श्रद्धाका; उपवसन्ति = सेवन करते हैं, ते = वे, विरजाः = रजोगुणरहित, सूर्यद्वारेण = सूर्यके मार्गसे, [तत्र] प्रयान्ति = वहाँ चले जाते हैं, यत्र हि = जहाँपर; सः = वह, अमृतः = जन्म-मृत्युसे रहित, अव्ययात्मा = नित्य, अविनाशी, पुरुषः = परम पुरुष (रहता है) ॥ ११ ॥

व्याख्या—उपर्युक्त भोगासक्त मनुष्योंसे जो सर्वथा भिन्न हैं, मनुष्यशरीरका महत्त्व समझ लेनेके कारण जिनके अन्तःकरणमे परमात्माका तत्त्व जाननेकी और परमेश्वरको प्राप्त करनेकी इच्छा जग उठी है, वे चाहे वनमें निवास करनेवाले वानप्रस्थ हों, शान्त स्वभाववाले विद्वान् सदाचारी गृहस्थ हों या भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी अथवा सन्यासी हों, वे तो निरन्तर तप और श्रद्धाका ही सेवन किया करते हैं, अर्थात् अपने-अपने वर्ण, आश्रम तथा परिस्थितिके अनुसार जिस समय जो कर्तव्य होता है, उसका शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बिना किसी प्रकारकी कामनाके पालन करते रहते हैं और सयमपूर्वक शम-दमादि साधनोंसे सम्पन्न होकर परम श्रद्धाके साथ परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके साधनोमे लगे रहते हैं। इसलिये तम और रजोगुणके विकारोंसे सर्वथा शून्य निर्मल सत्त्वगुणमें स्थित वे सज्जन सूर्यलोकमें होते हुए वहाँ चले जाते हैं, जहाँ उनके परम प्राप्य अमृतरूप नित्य अविनाशी परमपुरुष पुरुषोत्तम निवास करते ह ॥ ११ ॥

सम्बन्ध—उन परब्रह्म परमेश्वरको जानने और प्राप्त करनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं— परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥१२॥

कर्मचितान् = कर्मसे प्राप्त किये जानेवाले, लोकान् परीक्ष्य = लोकोंकी परीक्षा करके, ब्राह्मणः = ब्राह्मण, निर्वेदम् = वैराग्यको, आयात् = प्राप्त हो जाय (यह समझ ले कि), कृतेन = किये जानेवाले सकाम कर्मोंसे, अकृतः = स्वतःसिद्ध नित्य परमेश्वर, न अस्ति = नहीं मिल सकता, सः = वह, तद्विज्ञानार्थम् = उस परब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये; समित्पाणिः = हाथमें समिधा लेकर, श्रोत्रियम् = वेदको भलीभाँति जाननेवाले (ओर), ब्रह्मनिष्ठम् = परब्रह्म परमात्मामे स्थित, गुरुम् = गुरुके पास, एव = ही; अभिगच्छेत् = विनयपूर्वक जाय ॥ १२ ॥

व्याख्या—अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको पहले बतलाये हुए सकाम कर्मकि फलस्वरूप इस लोक और परलोकके