कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२६८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * चरते = अग्निहोत्र करता है; तम् = उस अग्निहोत्रीको, हि = निश्चय ही, आददायन् = अपने साथ लेकर, एताः = ये; आहुतयः = आहुतियाँ, सूर्यस्य = सूर्यकी, रश्मय [भूत्वा] = किरणें (बनकर); नयन्ति = (वहाँ) पहुँचा देती हैं; यत्र = जहाँ, देवानाम् = देवताओंका एकः = एकमात्र, पतिः = स्वामी (इन्द्र), अधिवास = निवास करता है ॥ ५ ॥ व्याख्या—जो कोई भी साधक पूर्वमन्त्रमे बतलायी हुई सात प्रकारकी लपटोंसे युक्त भलीभाँति प्रज्वलित अग्निमें ठीक समयपर शास्त्रविधिके अनुसार नित्यप्रति आहुति देकर अग्निहोत्र करता है, उसे मरणकालमे अपने साथ लेकर ये आहुतियाँ सूर्यकी किरणें बनकर वहाँ पहुँचा देती हैं, जहाँ देवताओंका एकमात्र स्वामी इन्द्र निवास करता है। तात्पर्य यह कि अग्निहोत्र स्वर्गके सुखोंकी प्राप्तिका अमोघ उपाय है ॥ ५ ॥ सम्बन्ध—किस प्रकार ये आहुतिया सूर्य-किरणोंद्वारा यजमानको इन्द्रलोकमे ले जाती हैं—ऐसा जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥ सुवर्चसः = (वे) देदीप्यमान, आहुतयः = आहुतियाँ, एहि एहि = आओ, आओ; एषः = यह, वः = तुम्हारे, सुकृतः = शुभ कमौसे प्राप्त पुण्यः = पवित्र ब्रह्मलोकः = ब्रह्मलोक (स्वर्ग) है इति = इस प्रकारकी, प्रियाम् = प्रिय, वाचम् = वाणी; अभिवदन्त्यः = बार-बार कहती हुई (और), अर्चयन्त्यः = उसका आदर सत्कार करती हुईं तम् = उस यजमानम् = यजमानको, सूर्यस्य = सूर्यकी रश्मिभिः = रश्मियोंद्वारा, वहन्ति = ले जाती हैं ॥ ६ ॥ व्याख्या—उन प्रदीप्त ज्वालाओंमे दी हुई आहुतियाँ सूर्यकी किरणोंके रूपमे परिणत होकर मरणकालमे उस साधक- से कहती हैं—'आओ, आओ, यह तुम्हारे शुभ कर्मका फलस्वरूप ब्रह्मलोक अर्थात् भोगरूप सुखोंको भोगनेका स्थान स्वर्ग- लोक है।' इस प्रकारकी प्रिय वाणी बार-बार कहती हुई आदर-सत्कारपूर्वक उसे सूर्यकी किरणोंके मार्गसे ले जाकर स्वर्गलोकमें पहुँचा देती हैं। यहाँ स्वर्गको ब्रह्मलोक कहनेका यह भाव मालूम होता है कि स्वर्गके अधिपति इन्द्र भी भगवान्के ही अपर स्वरूप हैं, अतः प्रकारान्तरसे ब्रह्म ही हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध—अब सांसारिक भोगोंमें वैराग्यकी और परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको पानेकी अभिलाषा उत्पन्न करनेके लिये उपर्युक्त स्वर्गलोकके साधनरूप यज्ञादि सकाम कर्म और उनके फलस्वरूप लौकिक एवं पारलौकिक भोगोंकी तुच्छता बतलाते हैं— प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥ हि = निश्चय ही, एते = ये यज्ञरूपाः = यज्ञरूप, अष्टादश प्लवाः = अठारह नौकाएँ, अदृढाः = अदृढ (अस्थिर) हैं; येषु = जिनमें, अवरम् = नीची श्रेणीका, कर्म = उपासनारहित सकाम कर्म, उक्तम् = बताया गया है, ये = जो, मूढाः = मूर्ख, एतत् [एव] = यही, श्रेयः = कल्याणका मार्ग है (यों मानकर), अभिनन्दन्ति = इसकी प्रशंसा करते हैं, ते = वे, पुन. अपि = बारबार, एव = निःसंदेह, जरामृत्युम् = वृद्धावस्था और मृत्युको, यन्ति = प्राप्त होते रहते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे यज्ञको नौकाका रूप दिया गया है और उनकी संख्या अठारह बतलायी गयी है; इससे अनुमान होता है कि नित्य, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य आदि भेदोंसे यज्ञके अठारह प्रधान भेद होते हैं। कहना यह है कि जिनमे उपासनारहित सकाम कर्मोंका वर्णन है, ऐसी ये यज्ञरूप अठारह नौकाएँ हैं, जो कि दृढ़ नहीं हैं। इनके द्वारा संसार- समुद्रसे पार होना तो दूर रहा, इस लोकके वर्तमान दुःखरूप छोटी सी नदीसे पार होकर स्वर्गतक पहुँचनेमे भी संदेह है, क्योंकि तीसरे मन्त्रके वर्णनानुसार किसी भी अङ्गकी कमी रह जानेपर वे साधकको स्वर्गमें नहीं पहुँचा सकतीं, बीचमें ही छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। इसलिये ये अदृढ अर्थात् अस्थिर हैं। इस रहस्यको न समझकर जो मूर्खलोग इन सकाम कर्मोंको ही कल्याणका उपाय समझकर—इनके ही फलको परम सुख मानकर इनकी प्रशंसा करते रहते हैं, उन्हे निःसंदेह बारम्बार वृद्धावस्था और मरणके दुःख भोगने पड़ते हैं ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—वे किस प्रकार दुःख भोगते हैं, इसका स्पष्टीकरण करते हैं—