भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 293
  • मुण्डकोपनिषद् * २६७ सम्बन्ध—नित्य अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यको उसके साथ-साथ और क्या-क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं— यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च। अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३ ॥ यस्य = जिसका, अग्निहोत्रम् = अग्निहोत्र, अदर्शम् = दर्शनामक यज्ञसे रहित है, अपौर्णमासम् = पौर्णमास नामक यज्ञसे रहित है, अचातुर्मास्यम् = चातुर्मास्यनामक यज्ञसे रहित है, अनाग्रयणम् = आग्रयण कर्मसे रहित है; च = तथा, अतिथिवर्जितम् = जिसमें अतिथि-सत्कार नहीं किया जाता, अहुतम् = जिसमें समयपर आहुति नहीं दी जाती, अवैश्वदेवम् = जो बलिवैश्वदेवनामक कर्मसे रहित है, (तथा) अविधिना हुतम् = जिसमें शास्त्र-विधिकी अवहेलना करके हवन किया गया है, ऐसा अग्निहोत्र, तस्य = उस अग्निहोत्रीके, आसप्तमान् = सातो, लोकान् = पुण्य लोकोंका; हिनस्ति = नाश कर देता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—नित्य अग्निहोत्र करनेवाला मनुष्य यदि दर्श* और पौर्णमासयज्ञ† नहीं करता या चातुर्मास्य यज्ञ‡ नहीं करता अथवा शरद् और वसन्त ऋतुओंमें की जानेवाली नवीन अन्नकी इष्टिरूप आग्रयण यज्ञ नहीं करता, यदि उसकी यज्ञशालामें अतिथियोंका विधिपूर्वक सत्कार नहीं किया जाता, या वह नित्य अग्निहोत्रमें ठीक समयपर और शास्त्रविधिके अनुसार हवन नहीं करता एव बलिवैश्वदेव-कर्म नहीं करता, तो उस अग्निहोत्र करनेवाले मनुष्यके सातो लोकोंको वह अङ्गहीन अग्निहोत्र नष्ट कर देता है। अर्थात् उस यज्ञके द्वारा उसे मिलनेवाले जो पृथ्वीलोकसे लेकर सत्यलोकतक सातों लोकोंमें प्राप्त होने योग्य भोग हैं, उनसे वह वञ्चित रह जाता है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—दूसरे मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि जब अग्निमें लपटें निकलने लगें, तब आहुति देनी चाहिये, अतः अब उन लपटोंके प्रकार-भेद और नाम बतलाते हैं— काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥ या = जो, काली = काली, कराली = कराली, च = तथा, मनोजवा = मनोजवा, च = और; सुलोहिता = सुलोहिता; च = तथा, सुधूम्रवर्णा = सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी = स्फुलिङ्गिनी, च = तथा, विश्वरुची देवी = विश्वरुची देवी, इति = ये (अग्निकी), सप्त = सात; लेलायमानाः = लपलपाती हुई, जिह्वाः = जिह्वाएँ हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—काली—काले रंगवाली, कराली—अति उग्र (जिसमें आग लग जानेका डर रहता है), मनोजवा—मन- की भाँति अत्यन्त चञ्चल, सुलोहिता—सुन्दर लाली लिये हुए, सुधूम्रवर्णा—सुन्दर धूएँके-से रंगवाली, स्फुलिङ्गिनी— चिनगारियोंवाली तथा विश्वरुची देवी—सब ओरसे प्रकाशित, देदीप्यमान—इस प्रकार ये सात तरहकी लपटें मानो अग्निदेवकी हविको ग्रहण करनेके लिये लपलपाती हुई सात जिह्वाएं हैं। अतः जब इस प्रकार अग्निदेवता आहुतिरूप भोजन ग्रहण करनेके लिये तैयार हों, उसी समय भोजनरूप आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये; अन्यथा अप्रज्वलित अथवा बुझी हुई अग्निमे दी हुई आहुति राखमें मिलकर व्यर्थ नष्ट हो जाती है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे प्रदीप्त अग्निमें नियमपूर्वक नित्यप्रति हवन करनेका फल बतलाते हैं— एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् । तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥ यः च = जो कोई भी अग्निहोत्री, एतेषु भ्राजमानेषु = इन देदीप्यमान ज्वालाओंमें, यथाकालम् = ठीक समयपर;
  • प्रत्येक अमावास्याको की जानेवाली इष्टि। † प्रत्येक पूर्णिमाको की जानेवाली इष्टि। ‡ चार महीनोंमें पूरा होनेवाला एक श्रौत यागविशेष।