भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 832 में से

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पृष्ठ 292

२६६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * परम कारण परब्रह्म परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति बतलाकर संक्षेपमें यह बात समझायी गयी कि उन सर्वशक्तिमान्, सर्वेश, सबके कर्ता-धर्ता परमेश्वरको जान लेनेपर यह सब कुछ ज्ञात हो जाता है ॥ ९ ॥ ॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड सम्बन्ध—पहले खण्डके चौथे मन्त्रमें परा और अपरा—इन दो विद्याओंको जाननेयोग्य बताया था, उनमेंसे अब इस खण्डमें अपरा विद्याका स्वरूप और फल बतलाकर परा विद्याकी जिज्ञासा उत्पन्न की जाती है— तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥ तत् = वह; एतत् = यह; सत्यम् = सत्य है कि; कवयः = बुद्धिमान् ऋषियोंने; यानि = जिन कर्माणि = कर्मोंको; मन्त्रेषु = वेद-मन्त्रोंमें; अपश्यन् = देखा था; तानि = वे; त्रेतायाम् = तीनो वेदोंमें; बहुधा = बहुत प्रकारसे; संततानि = व्याप्त हैं; सत्यकामाः = हे सत्यको चाहनेवाले मनुष्यो, ( तुमलोग ) तानि = उनको; नियतम् = नियमपूर्वक; आचरथ = अनुष्ठान करो; लोके = इस मनुष्य शरीरमे; वः = तुम्हारे लिये; एषः = यही; सुकृतस्य = शुभ कर्मकी फल प्राप्तिका; पन्थाः = मार्ग है ॥ १ ॥ व्याख्या—यह सर्वथा सत्य है कि बुद्धिमान् महर्षियोंने जिन उन्नतिके साधनरूप यज्ञादि नाना प्रकारके कर्मोंको वेद-मन्त्रोंमे पहले देखा था, वे कर्म ऋक्, यजुः और साम—इन तीनो वेदोंमें बहुत प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णित हैं ( गीता ४। ३२) । * अतः जागतिक उन्नति चाहनेवाले मनुष्योंको उन्हें भलीभाँति जानकर नियमपूर्वक उन कर्मोंको करते रहना चाहिये। इस मनुष्यशरीरमें यही उन्नतिका सुन्दर मार्ग है। आलस्य और प्रमादमें या भोगोंको भोगनेमे पशुओंकी भाँति जीवन बिता देना मनुष्यशरीरके उपयुक्त नहीं है। यही इस मन्त्रका भाव है ॥ १ ॥ सम्बन्ध—वेदोक्त अनेक प्रकारके कर्मोंमेंसे उपलक्षणरूपसे प्रधान अग्निहोत्ररूप कर्मका वर्णन आरम्भ करते हैं— यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने । तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥ यदा हि = जिस समय; हव्यवाहने समिद्धे = हविष्यको देवताओके पास पहुँचानेवाली अग्निके प्रदीप्त हो जानेपर; अर्चिः = (उसमें) ज्वालाएँ; लेलायते = लपलपाने लगती हैं; तदा = उस समय; आज्यभागौ अन्तरेण = आज्यभागके† बीचमें; आहुतीः = अन्य आहुतियोंको; प्रतिपादयेत् = डाले ॥ २ ॥ व्याख्या—अधिकारी मनुष्योंको नित्यप्रति अग्निहोत्र करना चाहिये। जब देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाली अग्नि अग्निहोत्रकी वेदीमें भलीभाँति प्रज्वलित हो जाय, उसमेंसे लपटें निकलने लगें, उस समय आज्यभागके स्थानको छोड़कर मध्यमे आहुतियाँ डालनी चाहिये। क्योंकि नित्य अग्निहोत्रमें आज्यभागकी दो आहुतियाँ देनेका नियम नहीं है। इससे यह बात भी समझायी गयी है कि जबतक अग्नि प्रदीप्त न हो, उसमेंसे लपटें न निकलने लगें, तबतक या निकलकर शान्त हो जायें, उस समय अग्निमें आहुति नहीं डालनी चाहिये। अग्निको अच्छी तरह प्रज्वलित करके ही अग्निहोत्र करना चाहिये ॥ २ ॥

  • प्रधानरूपसे वेदोंकी संख्या तीन ही मानी गयी है। जहाँ-तहाँ 'वेदत्रयी' आदि नामोंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—इन तीनका ही उल्लेख मिलता है। ऐसे स्थलोंमें चौथे अथर्ववेदको उक्त तीनोंके अन्तर्गत ही मानना चाहिये। † यजुर्वेदके अनुसार प्रजापतिके लिये मौनभावसे एक आहुति और इन्द्रके लिये 'आधार'नामकी दो घृताहुतियाँ देनेके पश्चात् जो अग्नि और सोम देवताओके लिये पृथक्-पृथक् दो आहुतियाँ दी जाती हैं, उनका नाम 'आज्यभाग' है। 'ॐ अग्नये स्वाहा' कहकर उत्तर-पूर्वार्धमें और 'ॐ सोमाय स्वाहा' कहकर दक्षिण-पूर्वार्धमें ये आहुतियाँ डाली जाती हैं, इनके बीचमें शेष आहुतियाँ डालनी चाहिये।
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