कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय मुण्डक प्रथम खण्ड सम्बन्ध-प्रथम मुण्डकके द्वितीय खण्डमें अपर विद्याका स्वरूप और फल बतलाया तथा उससे तुच्छता दिखाते हुए उससे विरक्त होनेकी बात कहकर परविद्या प्राप्त करनेके लिये सद्गुरुकी शरणमें जानेको कहा। अब परविद्याका वर्णन करनेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं- तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥ सोम्य = हे प्रिय !, तत् = वह, सत्यम् = सत्य, एतत् = यह है, यथा = जिस प्रकार, सुदीप्तात् पावकात् = प्रज्वलित अग्निमेंसे; सरूपाः = उसीके समान रूपवाली, सहस्रशः = हजारों; विस्फुलिङ्गाः = चिनगारियाँ, प्रभवन्ते = नाना प्रकारसे प्रकट होती हैं; तथा = उसी प्रकार, अक्षरात् = अविनाशी ब्रह्मसे, विविधाः = नाना प्रकारके, भावा = भाव; प्रजायन्ते = उत्पन्न होते हैं, च = और, तत्र एव = उसीमें, अपियन्ति = विलीन हो जाते हैं* ॥ १ ॥ व्याख्या-महर्षि अङ्गिरा कहते हैं-प्रिय शौनक ! मैंने तुमको पहले परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए (पूर्व प्रकरणके पहले खण्डमें छठे मन्त्रसे नवेंतक) जो रहस्य बतलाया था, वह सर्वथा सत्य है, अब उसीको पुनः समझाता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्निमेंसे उसीके जैसे रूप-रंगवाली हजारों चिनगारियाँ चारों ओर निकलती हैं, उसी प्रकार परमपुरुष अविनाशी ब्रह्मसे सृष्टिकालमें नाना प्रकारके भाव-मूर्त-अमूर्त पदार्थ उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुनः उन्हींमें लीन हो जाते हैं। यहाँ भावोंके प्रकट होनेकी बात समझानेके लिये ही अग्नि और चिनगारियोंका दृष्टान्त दिया गया है। उनके विलीन होनेकी बात दृष्टान्तसे स्पष्ट नहीं होती ॥ १ ॥ सम्बन्ध-जिन परब्रह्म अविनाशी पुरुषोत्तमसे यह जगत् उत्पन्न होकर पुन' उन्हींमें विलीन हो जाना है, वे स्वयं कैसे हैं-इस जिज्ञासापर कहते हैं- दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २ ॥ हि = निश्चय ही, दिव्यः = दिव्य, पुरुषः = पूर्णपुरुष; अमूर्तः = आकाररहित, सबाह्याभ्यन्तर. हि = समस्त जगत्के बाहर और भीतर भी व्याप्त, अज. = जन्मादि विकारोंसे अतीत, अप्राणः = प्राणरहित, अमनाः = मनरहित; हि = होनेके कारण, शुभ्र = सर्वथा विशुद्ध है (तथा), हि = इसीलिये, अक्षरात् = अविनाशी जीवात्मासे, परतः परः = अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ २ ॥ व्याख्या-वे दिव्य पुरुष परमात्मा निःसन्देह आकाररहित और समस्त जगत्के बाहर एव भीतर भी परिपूर्ण हैं। वे जन्म आदि विकारोंसे रहित, सर्वथा विशुद्ध है, क्योंकि उनके न तो प्राण हैं, न इन्द्रियाँ हैं और न मन ही है। वे इन सबके बिना ही सब कुछ-करनेमे समर्थ हैं, इसीलिये वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अविनाशी जीवात्मासे अत्यन्त श्रेष्ठ- सर्वथा उत्तम हैं ॥ २ ॥ सम्बन्ध-उपर्युक्त लक्षणोंवाले निराकार परमेश्वरसे यह साकार जगत् किस प्रकार उत्पन्न हो जाता है, इस जिज्ञासापर उनकी सर्वशक्तिमत्ताका वर्णन करते हैं-
- प्रथम मुण्डकके प्रथम खण्डके सातवें मन्त्रमें मकड़ी, पृथ्वी और मनुष्य-शरीरके दृष्टान्तसे जो बात कही थी, वही बात इस मन्त्रमें अग्निके दृष्टान्तसे समझायी गयी है ।