भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 832 में से

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पृष्ठ 299
  • मुण्डकोपनिषद् * २७३ एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥ एतस्मात् = इसी परमेश्वरसे, प्राणः = प्राण, जायते = उत्पन्न होता है ( तथा ), मनः = मन ( अन्तःकरण ), सर्वेन्द्रियाणि = समस्त इन्द्रियाँ, खम् = आकाश, वायुः = वायु, ज्योतिः = तेज, आपः = जल, च = और, विश्वस्य धारिणी = सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली, पृथिवी = पृथ्वी ( ये सब उत्पन्न होते हैं ) ॥ ३ ॥ व्याख्या—यद्यपि वे परब्रह्म पुरुषोत्तम निराकार और मन, इन्द्रिय आदि करण-समुदायसे सर्वथा रहित हैं, तथापि सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। इन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमसे ही सृष्टिकालमें प्राण, मन ( अन्तःकरण ) और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये पाँचो महाभूत, सब के सब उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार संक्षेपमें परमेश्वरसे सूक्ष्म तत्त्वोंकी उत्पत्तिका प्रकार बतलाकर अब इस जगत्में भगवान्‌का विराट्रूप देखनेका प्रकार बतलाते हैं— अग्निमूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥ अस्य = इस परमेश्वरका, अग्निः = अग्नि, मूर्धा = मस्तक है, चन्द्रसूर्यौ = चन्द्रमा और सूर्य, चक्षुषी = दोनों नेत्र हैं, दिशः = सब दिशाएँ, श्रोत्रे = दोनों कान हैं, च = और, विवृताः वेदाः = प्रकट वेद, वाक् = वाणी हैं ( तथा ), वायुः प्राणः = वायु प्राण है, विश्वम् हृदयम् = जगत् हृदय है, पद्भ्याम् = इसके दोनो पैरोंसे, पृथिवी = पृथ्वी उत्पन्न हुई है, एषः हि = यही, सर्वभूतान्तरात्मा = समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है ॥ ४ ॥ व्याख्या—दूसरे मन्त्रमें जिन परमेश्वरके निराकार स्वरूपका वर्णन किया गया है, उन्हीं परब्रह्मका यह प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला जगत् विराट्रूप है। इन विराट्स্বরূপ परमेश्वरका अग्नि अर्थात् द्युलोक ही मानो मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं, समस्त दिशाएँ कान हैं, नाना छन्द और ऋचाओंके रूपमें विस्तृत चारो वेद वाणी हैं, वायु प्राण है, सम्पूर्ण चराचर जगत् हृदय है, पृथ्वी मानो उनके पैर है। यही परब्रह्म परमेश्वर समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमात्मा हैं ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—उन परमात्मासे इस चराचर जगत्‌की उत्पत्ति किस क्रमसे होती है, इस जिज्ञासापर प्रकारान्तरसे जगत्‌की उत्पत्ति- का क्रम बतलाते हैं— तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान्रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥ तस्मात् = उससे ही, अग्निः = अग्निदेव प्रकट हुआ, यस्य समिधः = जिसकी समिधा, सूर्यः = सूर्य है, ( उस अग्निसे सोम उत्पन्न हुआ ) सोमात् = सोमसे, पर्जन्यः = मेघ उत्पन्न हुए (और मेघोंसे वर्षाद्वारा ), पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, ओषधयः = नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, रेतः = ( ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए ) वीर्यको, पुमान् = पुरुष, योषितायाम् = स्त्रीमे सिञ्चति = सिंचन करता है ( जिससे सतान उत्पन्न होती है ), [ एवम् = इस प्रकार, ] पुरुषात् = उस परम पुरुषसे ही, बह्वीः प्रजाः = नाना प्रकारके जीव, सम्प्रसूताः = नियमपूर्वक उत्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—जब जब परमेश्वरसे यह जगत् उत्पन्न होता है, तब-तब सदैव एक प्रकारसे ही होता हो—ऐसा नियम नहीं है। वे जब जैसा सङ्कल्प करते हैं, उसी प्रकार उसी क्रमसे जगत् उत्पन्न हो जाता है। इसी भावको प्रकट करनेके लिये यहाँ प्रकारान्तरसे सृष्टिकी उत्पत्ति बतलायी गयी है। मन्त्रका सारांश यह है कि परब्रह्म पुरुषोत्तमसे सर्वप्रथम तो उनकी अचिन्त्य शक्तिका एक अंश अद्भुत अग्नितत्त्व उत्पन्न हुआ, जिसकी समिधा ( इन्धन ) सूर्य है, अर्थात् जो सूर्यबिम्बके रूपमें
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