भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 832 में से

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पृष्ठ 300

२७४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * प्रज्वलित रहती है, अग्निसे चन्द्रमा उत्पन्न हुआ, चन्द्रमासे ( सूर्यकी रश्मियोंमे सूक्ष्मरूपसे स्थित जलमें कुछ शीतलता आ जानेके कारण ) मेघ उत्पन्न हुए । मेघोंसे वर्षाद्वारा पृथ्वीमें नाना प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं । उन ओषधियोंके भक्षणसे उत्पन्न हुए वीर्यको जब पुरुष अपनी जातिकी स्त्रीमे सिंचन करता है, तब उससे सन्तान उत्पन्न होती है। इस प्रकार परमपुरुष परमेश्वरसे ये नाना प्रकारके चराचर जीव उत्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका क्रम बतलाकर अब उन सबकी रक्षाके लिये किये जानेवाले यज्ञादि, उनके साधन और फल भी उन्हीं परमेश्वरसे प्रकट होते हैं—यह बात बतायी जाती है— तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च । संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥ तस्मात् = उस परमेश्वरसे ही, ऋचः = ऋग्वेदकी ऋचाएँ, साम = सामवेदके मन्त्र, यजूंषि = यजुर्वेदकी श्रुतियाँ, [ च = और; ] दीक्षा = दीक्षा, च = तथा, सर्वे = समस्त, यज्ञाः = यज्ञ, क्रतवः = क्रतु, च = एव, दक्षिणाः = दक्षिणाएँ, च = तथा, संवत्सरः = संवत्सररूप काल, यजमानः = यजमान, च = और, लोकाः = सब लोक ( उत्पन्न हुए हैं ); यत्र = जहाँ, सोमः = चन्द्रमा, पवते = प्रकाश फैलाता है ( और ), यत्र = जहाँ, सूर्यः = सूर्य, [ पवते = प्रकाश देता है ] ॥ ६ ॥ व्याख्या-उन परमेश्वरसे ही ऋग्वेदकी ऋचाएँ, सामवेदके मन्त्र और यजुर्वेदकी श्रुतियाँ एव यज्ञादि कर्मोंकी दीक्षा,* सब प्रकारके यज्ञ और क्रतु,†उनमें दी जानेवाली दक्षिणाएँ, जिसमें वे किये जाते हैं—वह संवत्सररूप काल, उनको करनेका अधिकारी यजमान, उनके फलस्वरूप वे सब लोक, जहाँ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाश फैलाते हैं,—ये सब उत्पन्न हुए हैं ॥६॥ सम्बन्ध-अब देवादि समस्त प्राणियोंके भेद और सब प्रकारके सदाचार भी उन्हीं ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हैं, यह बतलाते हैं— तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥ च = तथा, तस्मात् = उसी परमेश्वरसे, बहुधा = अनेक भेदोंवाले, देवाः = देवतालोग; सम्प्रसूताः = उत्पन्न हुए, साध्याः = साध्यगण, मनुष्याः = मनुष्य, पशवः वयांसि = पशु-पक्षी; प्राणापानौ = प्राण अपान वायु; व्रीहियवौ = धान, जौ आदि अन्न, च = तथा, तपः = तप; श्रद्धा = श्रद्धा, सत्यम् = सत्य ( और ); ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्य; च = एव; विधिः = यज्ञ आदिके अनुष्ठानकी विधि भी; [ एते सम्प्रसूताः = ये सब के सब उत्पन्न हुए हैं ] ॥ ७ ॥ व्याख्या-उन परब्रह्म परमेश्वरसे ही वसु, रुद्र आदि अनेक भेदोंवाले देवतालोग उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे साध्यगण, नाना प्रकारके मनुष्य, विभिन्न जातियोंके पशु, विविध भाँतिके पक्षी और अन्य सब प्राणी उत्पन्न हुए हैं। सबके जीवनरूप प्राण और अपान तथा सब प्राणियोंके आहाररूप धान, जौ आदि अनेक प्रकारके अन्न भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। उन्हींसे तप, श्रद्धा, सत्य और ब्रह्मचर्य प्रकट हुए हैं तथा यज्ञादि कर्म करनेकी विधि भी उन परमेश्वरसे ही प्रकट हुई है। तात्पर्य यह कि सब कुछ उन्हींसे उत्पन्न हुआ है। वे ही सबके परम कारण है ॥ ७ ॥ सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥ तस्मात् = उसी परमेश्वरसे, सप्त = सात, प्राणाः = प्राण, प्रभवन्ति = उत्पन्न होते हैं ( तथा ), सप्त अर्चिषः = अग्निकी ( काली-कराली आदि ) सात लपटें, [ सप्त ] समिधः = सात ( विषयरूपी ) समिधाएँ, सप्त = सात प्रकारके, होमाः = हवन ( तथा ), इमे सप्त लोकाः = ये सात लोक-इन्द्रियोंके सात द्वार ( उसीसे उत्पन्न होते हैं ), येषु = जिनमें, प्राणाः = प्राण,

  • शास्त्रविधिके अनुसार किसी यज्ञका आरम्भ करते समय यजमान जो सकल्पके साथ उसके अनुष्ठानसम्बन्धी नियमोंके पालनका व्रत लेता है, उसका नाम 'दीक्षा' है। † यज्ञ और ऋतु—ये यज्ञके ही दो भेद हैं। जिन यज्ञोंमें यूप बनानेकी विधि है, उन्हें 'क्रतु' कहते हैं ।
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