कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 301, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 301
An exact transcription of the provided image:
चरन्ति = विचरते हैं, गुहाशयाः = हृदयरूप गुफामें शयन करनेवाले ये; सप्त सप्त = सात-सातके समुदाय; निहिताः = (उसीके द्वारा) सब प्राणियोंमे स्थापित किये हुए हैं ॥ ८ ॥ व्याख्या—उन्हीं परमेश्वरसे सात प्राण अर्थात् जिनमे विषयोंको प्रकाशित करनेकी विशेष शक्ति है, ऐसी सात इन्द्रियाँ—कान, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण तथा वाणी एव मन, * मन और इन्द्रियोंकी मनन करना, सुनना, स्पर्श करना, देखना, स्वाद लेना, सूँघना और बोलना इस प्रकार सात वृत्तियाँ अर्थात् विषय ग्रहण करनेवाली शक्तियाँ, उन इन्द्रियोके विषयरूप सात समिधाएँ, सात प्रकारका हवन अर्थात् बाह्यविषयरूप समिधाओका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें निक्षेपरूप क्रिया और इन इन्द्रियोंके वासस्थानरूप सात लोक, जिनमें रहकर ये इन्द्रियरूप सात प्राण अपना-अपना कार्य करते हैं,— निद्राके समय मनके साथ एक होकर हृदयरूप गुफामे शयन करनेवाले ये सात-सातके समुदाय परमेश्वरके द्वारा ही समस्त प्राणियोंमें स्थापित किये हैं ॥ ८॥ सम्बन्ध—इस प्रकार आध्यात्मिक वस्तुओंकी उत्पत्ति और स्थिति परमेश्वरसे बतलाकर अब बाह्य जगत्की उत्पत्ति भी उसीसे बताते हुए प्रकरणका उपसहार करते है— अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः । अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥ अतः = इसीसे, सर्वे = समस्त, समुद्राः = समुद्र, च = और, गिरयः = पर्वत (उत्पन्न हुए हैं), अस्मात् = इसीसे (प्रकट होकर), सर्वरूपाः = अनेक रूपोवाली, सिन्धवः = नदियाँ, स्यन्दन्ते = बहती हैं, च = तथा, अतः = इसीसे, सर्वाः = सम्पूर्ण, ओषधयः = ओषधियाँ, च = और, रसः = रस (उत्पन्न हुए है); येन = जिस रससे (पुष्ट हुए शरीरोंमें), हि = ही; एषः = यह, अन्तरात्मा = (सबका) अन्तरात्मा (परमेश्वर); भूतैः = सब प्राणियों (की आत्मा) के सहित; तिष्ठते = (उन-उनके हृदयमें) स्थित है ॥ ९ ॥ व्याख्या—इन्हीं परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं, इन्हींसे निकलकर अनेक आकारवाली नदियाँ बह रही हैं, इन्हींसे समस्त ओषधियाँ और वह रस भी उत्पन्न हुआ है, जिससे पुष्ट हुए शरीरोंमे वे सबके अन्तरात्मा परमेश्वर उन सब प्राणियोंकी आत्माके सहित उन-उनके हृदयमे रहते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—उन परमेश्वरसे सबकी उत्पत्ति होनेके कारण सब उन्हींका स्वरूप है, यह कहकर उनको जाननेका फल बताते हुए इस खण्डकी समाप्ति करते हैं— पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थि विविकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥ तपः = तप, कर्म = कर्म (और), परामृतम् = परम अमृतरूप, ब्रह्म = ब्रह्म, इदम् = यह, विश्वम् = सब कुछ, पुरुषः एव = परमपुरुष पुरुषोत्तम ही है, सोम्य = हे प्रिय, एतत् = इस; गुहायाम् = हृदयरूप गुफामें, निहितम् = स्थित अन्तर्यामी परमपुरुषको, यः = जो, वेद = जानता है, सः = वह, इह [एव] = यहाँ (इस मनुष्यशरीरमें) ही, अविद्याग्रन्थिम् = अविद्या- जनित गाँठको, विकिरति = खोल डालता है ॥ १० ॥ व्याख्या—तप अर्थात् सयमम्प साधन, कर्म अर्थात् बाह्य साधनोद्वारा किये जानेवाले कृत्य तथा परम अमृत ब्रह्म— यह सब कुछ परम पुरुष पुरुषोत्तम ही है। प्रिय शौनक ! हृदयरूप गुफामें छिपे हुए इन अन्तर्यामी परमेश्वरको जो जान लेता है, वह इस मनुष्यशरीरमें ही अविद्याजनित अन्तःकरणकी गाँठका भेदन कर देता है अर्थात् सब प्रकारके सशय और भ्रमसे रहित होकर परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त हो जाता है ॥ १० ॥ ॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
- ब्रह्मसूत्रमें इस विषयपर विचार किया गया है कि यहाँ इन्द्रियाँ सात ही क्यों बतलायी गयी हैं। वहाँ कहा गया है कि इन सातके अतिरिक्त हाथ, पैर, उपस्थ तथा गुदा भी इन्द्रियाँ हैं, अत मनसहित कुल ग्यारह इन्द्रियाँ हैं। यहाँ प्रधानतासे सातका वर्णन है (ब्रह्मसूत्र २।४।५, ६)।