कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति - द्वितीय खण्ड आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ १ ॥ आविः = (जो) प्रकाशस्वरूप संनिहितम् = अत्यन्त समीपस्थ गुहाचरम् नाम = (हृदयरूप गुहामे स्थित होनेके कारण) गुहाचर नामसे प्रसिद्ध महत् पदम् = (और) महान् पद (परम प्राप्य) है यत् = जितने भी एजत् = चेष्टा करनेवाले; प्राणत् = श्वास लेनेवाले, च = और निमिषत् = आँखोंको खोलने-मूँदनेवाले प्राणी हे एतत् = ये (सब-के-सब) अत्र = इसीमे; समर्पितम् = समर्पित (प्रतिष्ठित) है एतत् = उस परमेश्वरको जानथ = तुमलोग जानो यत् = जो, सत् = सत्, असत् = (और) असत् है वरेण्यम् = सबके द्वारा वरण करने योग्य (और) वरिष्ठम् = अतिशय श्रेष्ठ है (तथा), प्रजानाम् = समस्त प्राणियोंकी विज्ञानात् = बुद्धिसे, परम् = परे अर्थात् जाननेमे न आनेवाला हे ॥ १ ॥ व्याख्या—सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी परमेश्वर प्रकाशस्वरूप है। समस्त प्राणियोंके अत्यन्त समीप उनकी हृदयरूप गुहामे छिपे रहनेके कारण ही ये गुहाचर नामसे प्रसिद्ध है। जितने भी हिलने चलनेवाले श्वास लेनेवाले और आँख खोलने मूँदनेवाले प्राणी हैं, उन सबका समुदाय इन्हीं परमेश्वरमे समर्पित अर्थात् स्थित है। सबके आश्रय ये परमात्मा ही हैं। तुम इनको जानो। ये सत् और असत् अर्थात् कार्य और कारण एव प्रकट और अप्रकट—सब कुछ है। सबके द्वारा वरण करने योग्य और अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा समस्त प्राणियोंकी बुद्धिसे परे अर्थात् बुद्धिद्वारा अज्ञेय हे ॥ १ ॥ सम्बन्ध—उन्हीं परब्रह्म परमेश्वरको समझानेके लिये पुनः उनके स्वरूपका दूसरे शब्दोंमे वर्णन करते हैं— यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिल्लोका निहिता लोकिनश्च । तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः । तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २ ॥ यत् = जो अर्चिमत् = दीप्तिमान् है च = और यत् = जो अणुभ्यः = सूक्ष्मोंसे भी अणु = सूक्ष्म है, यस्मिन् = जिनमें लोकाः = समस्त लोक, च = और, लोकिनः = उन लोगोमे रहनेवाले प्राणी निहिताः = स्थित है, तत् = वही; एतत् = यह अक्षरम् = अविनाशी ब्रह्म = ब्रह्म है सः = वही प्राणः = प्राण है तत् उ = वही वाक् = वाणी, मनः = (और) मन है तत् = वही एतत् = यह, सत्यम् = सत्य है, तत् = वह अमृतम् = अमृत है सोम्य = हे प्यारे तत् = उस; वेद्धव्यम् = वेधने योग्य लक्ष्यको विद्धि = तू वेध ॥ २ ॥ व्याख्या—जो परब्रह्म परमेश्वर अतिशय देदीप्यमान—प्रकाशस्वरूप हैं, जो सूक्ष्मोंमे भी अतिशय सूक्ष्म हैं, जिनमे समस्त लोक और उन लोकोंमें रहनेवाले समस्त प्राणी स्थित हैं अर्थात् ये सब जिनके आश्रित हैं, वे ही परम अक्षर ब्रह्म हैं, वे ही सबके जीवनदाता प्राण हैं, वे ही सबकी वाणी और मन अर्थात् समस्त जगत्के इन्द्रिय और अन्तःकरणरूपमे प्रकट हैं। वे ही यह परम सत्य और अमृत—अविनाशी तत्त्व हैं। प्रिय शौनक ! उस वेधने योग्य लक्ष्यको तू वेध अर्थात् आगे बताये जानेवाले प्रकारमे साधन करके उसमें तन्मय हो जा ॥ २ ॥ सम्बन्ध—लक्ष्यको बेधनेके लिय धनुष और बाण चाहिये, अतः उस रूपककी पूर्णताके लिये मार्ग सामग्रीका वर्णन करते हैं— धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं संधयीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥ औपनिषदम् = उपनिषद्में वर्णित प्रणवरूप महास्त्रम् = महान् अस्त्र धनुः = धनुषको गृहीत्वा = लेकर (उसपर), हि = निश्चय ही, उपासानिशितम् = उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ, शरम् = बाण संधयीत = चढ़ाये भावगतेन = (फिर) भावपूर्ण, चेतसा = चित्तके द्वारा, तत् = उस बाणको, आयम्य = खींचकर सोम्य = हे प्रिय तत् = उस अक्षरम् = परम अक्षर- पुरुषोत्तमको, एव = ही लक्ष्यम् = लक्ष्य मानकर विद्धि = वेधे ॥ ३ ॥