भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 832 में से

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पृष्ठ 303
  • मुण्डकोपनिषद् * २७७ व्याख्या-जिस प्रकार किसी बाणको लक्ष्यपर छोड़नेसे पहले उसकी नोकको सानपर धरकर तेज किया जाता है, उसपर चढ़े हुए मोरचे आदिको दूर करके उसे उज्ज्वल एव चमकीला बनाया जाता है, उसी प्रकार आत्मारूपी बाणको उपासनाद्वारा निर्मल एव शुद्ध बनाकर उसका प्रणवरूप धनुषपर भलीभाँति संधान करना चाहिये । अर्थात् आत्माको प्रणवके उच्चारण एव उसके अर्थरूप परमात्माके चिन्तनमे सम्यक् प्रकारसे लगाना चाहिये । इसके अनन्तर जैसे धनुषको पूरी शक्तिसे खींचकर बाणको लक्ष्यपर छोड़ा जाता है, जिससे वह पूरी तरहसे लक्ष्यको बेध सके, उसी प्रकार यहाँ भावपूर्ण चित्तसे ओंकारका अधिक-से-अधिक लबा उच्चारण एव उसके अर्थका प्रगाढ एव सुदीर्घ कालतक चिन्तन करनेके लिये कहा गया है, जिससे आत्मा निश्चितरूपसे परमात्मामे प्रवेश कर जाय, उसमे एकीभावसे अविचल स्थिति प्राप्त कर ले । दूसरे शब्दोंमें, ओंकारका प्रेमपूर्वक उच्चारण एव उसके अर्थरूप परमात्माका प्रगाढ चिन्तन ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम उपाय है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध-पूर्वमन्त्रमें कहे हुए रूपकको यहाँ स्पष्ट करते हैं- प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४ ॥ प्रणवः = (यहाँ) ओंकार ही, धनुः = धनुष है, आत्मा = आत्मा, हि = ही, शरः = बाण है (और), ब्रह्म = परब्रह्म परमेश्वर ही, तल्लक्ष्यम् = उसका लक्ष्य, उच्यते = कहा जाता है, अप्रमत्तेन = (वह) प्रमादरहित मनुष्यद्वारा ही, वेद्धव्यम् = बींधा जाने योग्य है (अतः) शरवत् = (उसे बेधकर) बाणकी तरह, तन्मयः = (उस लक्ष्यमे) तन्मय, भवेत् = हो जाना चाहिये ॥ ४ ॥ व्याख्या-ऊपर बतलाये हुए रूपकमे परमेश्वरका वाचक प्रणव (ओंकार) ही मानो धनुष है, यह जीवात्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसके लक्ष्य हे । प्रमादरहित तत्परतासे उनकी उपासना करनेवाले साधकद्वारा ही वह लक्ष्य बेधा जा सकता है, इसलिये हे सोम्य ! तुझे पूर्वोक्तरूपसे उस लक्ष्यको बेधकर बाणकी ही भाँति उसमें तन्मय हो जाना चाहिये ॥ ४ ॥ सम्बन्ध-पुन परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए प्रमादरहित और विरक्त होकर उसे जाननेके लिये श्रुति कहती है- यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५ ॥ यस्मिन् = जिसमें, द्यौः = स्वर्ग, पृथिवी = पृथ्वी, च = और, अन्तरिक्षम् = उनके बीचका आकाश; च = तथा, सर्वैः प्राणैः सह = समस्त प्राणोंके सहित, मनः = मन, ओतम् = गुँथा हुआ है, तम् एव = उसी, एकम् = एक, आत्मानम् = सबके आत्मरूप परमेश्वरको, जानथ = जानो, अन्याः = दूसरी, वाचः = सब बातोंको, विमुञ्चथ = सर्वथा छोड़ दो, एषः = यही, अमृतस्य = अमृतका, सेतुः = सेतु है ॥ ५ ॥ व्याख्या-जिन परब्रह्म परमात्मामे स्वर्ग, पृथ्वी तथा उनके बीचका सम्पूर्ण आकाश एव समस्त प्राण और इन्द्रियोंके सहित मन-बुद्धिरूप अन्तःकरण सब के-सब ओतप्रोत हैं, उन्हीं एक सर्वात्मा परमेश्वरको तुम पूर्वोक्त उपायके द्वारा जानो, दूसरी सब बातोंको-ग्राम्यचर्चांको सर्वथा छोड़ दो। वे सब तुम्हारे साधनमे विघ्न हैं, अतः उनसे सर्वथा विरक्त होकर साधनमें तत्पर हो जाओ । यही अमृतका सेतु है, अर्थात् ससार-समुद्रसे पार होकर अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पुलके सदृश है ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-पुन परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए उनकी प्राप्तिका साधन बताते हैं- अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः । ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ ६ ॥
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