कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 283
- प्रश्नोपनिषद् * २५९ सः = उसने प्राणम् असृजत = ( यह सोचकर सबसे पहले ) प्राणकी रचना की; प्राणात् श्रद्धा = प्राणके बाद श्रद्धाको ( उत्पन्न किया ), खम् वायुः ज्योतिः आपः पृथिवी = ( उसके बाद क्रमशः ) आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी ( ये पाँच महाभूत प्रकट हुए; फिर ); मनः इन्द्रियम् = मन ( अन्तःकरण ) और इन्द्रियसमुदाय ( की उत्पत्ति हुई ), अन्नम् = ( अनन्तर ) अन्न हुआ; अन्नात् = अन्नसे; वीर्यम् = वीर्य ( की रचना हुई, फिर ); तपः = तप; मन्त्राः = नाना प्रकारके मन्त्र; कर्म = नाना प्रकारके कर्म; च लोकाः = और उनके फलरूप भिन्न-भिन्न लोकों ( का निर्माण हुआ ); च = और; लोकेषु = उन लोकोंमें, नाम = नाम ( की रचना हुई ) ॥ ४ ॥ व्याख्या-परब्रह्म परमेश्वरने सर्वप्रथम सबके प्राणरूप सर्वात्मा हिरण्यगर्भको बनाया। उसके बाद शुभकर्ममें प्रवृत्त करानेवाली श्रद्धा अर्थात् आस्तिक-बुद्धिको प्रकट करके फिर क्रमशः शरीरके उपादानभूत आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी-इन पाँच महाभूतोंकी सृष्टि की। इन पाँच महाभूतोंका कार्य ही यह दृश्यमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। पाँच महाभूतोंके बाद परमेश्वरने मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार-इन चारोंके समुदायरूप अन्तःकरणको रचा। फिर विषयोंके ज्ञान एव कर्मके लिये पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच कर्मेन्द्रियोंको उत्पन्न किया, फिर प्राणियोंके शरीरकी स्थितिके लिये अन्नकी और अन्नके परिपाकद्वारा बलकी सृष्टि की। उसके बाद अन्तःकरण और इन्द्रियोंके संयमरूप तपका प्रादुर्भाव किया। उपासनाके लिये भिन्न-भिन्न मन्त्रोंकी कल्पना की। अन्तःकरणके संयोगसे इन्द्रियोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंका निर्माण किया। उनके भिन्न-भिन्न फलरूप लोकोंको बनाया और उन सबके नाम-रूपोंकी रचना की। इस प्रकार सोलह कलाओंसे युक्त इस ब्रह्माण्डकी रचना करके जीवात्माके सहित परमेश्वर स्वयं इसमें प्रविष्ट हो गये; इसीलिये वे सोलह कलाओंवाले पुरुष कहलाते हैं। हमारा यह मनुष्य-शरीर भी ब्रह्माण्डका ही एक छोटा-सा नमूना है, अतः परमेश्वर जिस प्रकार इस सारे ब्रह्माण्डमें हैं, उसी प्रकार हमारे इस शरीरमें भी हैं और इस शरीरमें भी वे सोलह कलाएँ वर्तमान हैं। उन हृदयस्थ परमदेव पुरुषोत्तमको जान लेना ही उस सोलह कलावाले पुरुषको जान लेना है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध-सर्गके आरम्भका वर्णन करके जिन परब्रह्मका लक्ष्य कराया गया, उन्हींका अब प्रलयके वर्णनसे लक्ष्य करते हैं- स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते 'नामरूपे इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५॥ सः = वह ( प्रलयका दृष्टान्त ) इस प्रकार है; यथा = जिस प्रकार; इमाः = ये; नद्यः = नदियाँ, समुद्रायणाः = समुद्रकी ओर लक्ष्य करके जाती, स्यन्दमानाः = ( और ) बहती हुई; समुद्रम् = समुद्रको, प्राप्य = पाकर, अस्तम् गच्छन्ति = ( उसीमें ) विलीन हो जाती हैं; तासाम् नामरूपे = उनके नाम और रूप; भिद्येते = नष्ट हो जाते हैं; समुद्रः इति एवम् = ( फिर ) समुद्र इस एक नामसे ही, प्रोच्यते = पुकारी जाती हैं; एवम् एव = इसी प्रकार; अस्य परिद्रष्टुः = सब ओरसे पूर्णतया देखनेवाले इन परमेश्वरकी, इमाः = ये ( ऊपर बतायी हुई ); षोडश कलाः = सोलह कलाएँ, पुरुषायणाः = जिनका परमाधार और परमगति पुरुष है; पुरुषम् प्राप्य = ( प्रलयकालमें ) परम पुरुष परमात्माको पाकर, अस्तम् गच्छन्ति = ( उन्हींमें) विलीन हो जाती हैं, च = तथा, आसाम् = इन सबके; नामरूपे = ( पृथक्-पृथक् ) नाम और रूप; भिद्येते = नष्ट हो जाते हैं, पुरुषः इति एवम् = फिर 'पुरुष' इस एक नामसे ही, प्रोच्यते = पुकारी जाती हैं; सः = वही; एषः = यह; अकलः = कलारहित ( और ); अमृतः = अमर परमात्मा, भवति = है, तत् = उसके विषयमें; एषः = यह ( अगला ); श्लोकः = श्लोक है ॥ ५ ॥ —जिस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम और रूपोंवाली ये बहुत-सी नदियाँ अपने उद्गमस्थान समुद्रकी ओर दौड़ती हुई समुद्रमें पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उनका समुद्रसे पृथक् कोई नाम-रूप नहीं रहता—वे समुद्र ही बन जाती हैं, उसी प्रकार सर्वसाक्षी सबके आत्मरूप परमात्मासे उत्पन्न हुई ये सोलह कलाएँ ( अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ) प्रलयकालमें अपने परमाधार परम पुरुष परमेश्वरमें जाकर उसीमें विलीन हो जाती हैं। फिर इन सबके अलग-अलग नाम-रूप नहीं रहते।