कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * एकमात्र परम पुरुष परमेश्वरके स्वरूपमे ये तदाकार हो जाती हैं। अतः उन्हीके नामसे, उन्हीके वर्णनमे इनका वर्णन होता है, अलग नहीं। उस समय परमात्मामे किसी प्रकारका सङ्कल्प नहीं रहता। अतः वे सब कलाओंसे रहित, अमृतरूप कहे जाते हैं। इस तत्त्वको समझनेवाला मनुष्य भी उन परब्रह्मको प्राप्त होकर अकल और अमर हो जाता है। इस विषयपर आगे कहा जानेवाला मन्त्र है ॥ ५ ॥ अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः । तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥ रथनाभौ=रथ-चक्रकी नाभिके आधारपर; अराः इव=जिस प्रकार अरे स्थित होते हैं (वैसे ही), यस्मिन्= जिसमे; कलाः=(ऊपर बतायी हुई सब) कलाएँ; प्रतिष्ठिताः=सर्वथा स्थित हैं; तम् वेद्यम् पुरुषम्=उस जानने- योग्य (सबके आधारभूत) परम पुरुष परमेश्वरको; वेद=जानना चाहिये; यथा=जिसमे (हे शिष्यगण) वः=तुमलोगोंको; मृत्युः=मृत्यु मा परिव्यथाः इति=दुःख न दे सके ॥ ६ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमे सर्वाधार परमेश्वरको जाननेके लिये प्रेरणा करके उसका फल जन्म मृत्युसे रहित हो जाना बताया गया है। महर्षि पिप्पलाद अपने शिष्योसे कहते हैं—'जिस प्रकार रथके पहियेमे लगे रहनेवाले सब अरे उस पहियेके मध्यस्थ नाभिमे प्रविष्ट रहते हैं, उन सबका आधार नाभि है—नाभिके बिना वे टिक ही नहीं सकते, उसी प्रकार ऊपर बतायी हुई प्राण आदि सोलह कलाओके जो आधार हैं, ये सब कलाएँ जिनके आश्रित हैं, जिनमें उत्पन्न होती हैं और जिनमें विलीन हो जाती हैं, वे ही जानने योग्य परब्रह्म परमेश्वर हैं। उन सर्वाधार परमात्माको जानना चाहिये। उन्हें जान लेनेके बाद तुम्हें मौतका डर नहीं रहेगा, फिर मृत्यु तुमको इस जन्म-मृत्युयुक्त ससारमें डालकर दुःखी नहीं कर सकेगी। तुमलोग सदाके लिये अमर हो जाओगे' ॥ ६ ॥ तान्होवाचैतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥ ह=(तत्पश्चात्) उन प्रसिद्ध महर्षि पिप्पलादने; तान् उवाच=उन सबमे कहा; एतत्=इम; परम् ब्रह्म=परम ब्रह्म को; अहम्=मै; एतावत्=इतना; एव=ही; वेद=जानता हूँ; अतः परम्=इससे पर, (उत्कृष्ट तत्त्व); न=नहीं; अस्ति इति=है ॥७॥ व्याख्या—इतना उपदेश करनेके बाद महर्षि पिप्पलादने परम भाग्यवान् सुकेशा आदि छहों ऋषियोको सम्बोधन करके कहा—'ऋषियो ! इन परब्रह्म परमेश्वरके विषयमें मै इतना ही जानता हूँ। इनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है।' मैने तुमलोगोसे उनके विषयमे जो कुछ कहना था, वह कह दिया ॥ ७ ॥ सम्बन्ध—अन्तमें कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे शिष्यगण महर्षिको बारवार प्रणाम करते हुए कहते हैं— ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥ ते=उन छहों ऋषियोंने; तम् अर्चयन्तः=पिप्पलादकी पूजा की (और कहा ); त्वम्=आप; हि=ही; नः=हमारे; पिता=पिता (है); यः=जिन्होंने; अस्माकम्=हमलोगोको; अविद्यायाः परम् पारम्=अविद्याके दूसरे पार; तारयसि इति=पहुँचा दिया है; नमः परमऋषिभ्यः=आप परम ऋषिको नमस्कार है; नमः परमऋषिभ्यः=परम ऋषि- को नमस्कार है ॥ ८ ॥ व्याख्या—इस प्रकार आचार्य पिप्पलादसे ब्रह्मका उपदेश पाकर उन छहों ऋषियोंने पिप्पलादकी पूजा की और कहा—'भगवन् ! आप ही हमारे वास्तविक पिता हैं, जिन्होंने हमें इस ससार-समुद्रके पार पहुँचा दिया। ऐसे गुरुके