कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ मुण्डकोपनिषद् यह उपनिषद् अथर्ववेदकी शौनकी शाखामे है । शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाऽसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ प्रश्नोपनिषद्में दिया जा चुका है । प्रथम मुण्डक प्रथम खण्ड ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥ ‘ॐ’ इस परमेश्वरके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है । इसके द्वारा यहाँ यह सूचित किया गया है कि मनुष्यको प्रत्येक कार्यके आरम्भमें ईश्वरका स्मरण तथा उनके नामका उच्चारण अवश्य करना चाहिये । विश्वस्य कर्ता=सम्पूर्ण जगत्के रचयिता ( और ); भुवनस्य गोप्ता=सब लोकोकी रक्षा करनेवाले, ब्रह्मा= ( चतुर्मुख ) ब्रह्माजी, देवानाम्=सब देवताओंमें, प्रथमः=पहले, सम्बभूव=प्रकट हुए, स'=उन्होंने; ज्येष्ठपुत्राय अथर्वाय=सबसे बड़े पुत्र अथर्वाको, सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्=समस्त विद्याओंकी आधारभूता, ब्रह्मविद्याम् प्राह=ब्रह्मविद्याका भलीभाँति उपदेश किया ॥ १ ॥ व्याख्या—सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरसे देवताओंमें सर्वप्रथम ब्रह्मा प्रकट हुए । फिर इन्होंने ही सब देवताओ, महर्षियो और मरीचि आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया । साथ ही, समस्त लोकोकी रचना भी की तथा उन सबकी रक्षाके सुदृढ नियम आदि बनाये । उनके सबसे बड़े पुत्र महर्षि अथर्वा थे, उन्हींको सबसे पहले ब्रह्माजीने ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था । जिस विद्यासे ब्रह्मके पर और अपर—दोनों स्वरूपोंका पूर्णतया ज्ञान हो, उसे ब्रह्मविद्या कहते है, यह सम्पूर्ण विद्याओंकी आश्रय है ॥ १ ॥ अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माथर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥