भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

२८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तान्वरिष्ठः प्राण उवाच । मा मोहमापद्यथाहमेवैतत्पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥ तान् वरिष्ठः प्राणः = उनसे सर्वश्रेष्ठ प्राण उवाच = बोला, मोहम् = (तुमलोग) मोहमें; मा आपद्यथ = न पड़ो अहम् एव = मै ही एतत् आत्मानम् = अपने इस स्वरूपको पञ्चधा प्रविभज्य = पाँच भागोंमें विभक्त करके, एतत् वाणम् = इस शरीरको अवष्टभ्य = आश्रय देकर, विधारयामि = धारण करता हूँ, इति ते = यह (सुनकर भी) वे; अश्रद्दधानाः = अविश्वासी ही बभूवुः = बने रहे ॥ ३ ॥ व्याख्या—इस प्रकार जब सम्पूर्ण महाभूत इन्द्रियाँ और अन्तःकरणरूप देवता परस्पर विवाद करने लगे, तब सर्वश्रेष्ठ प्राणने उनसे कहा—'तुमलोग अज्ञानवश आपसमें विवाद मत करो तुम्मेंसे किसीमें भी इस शरीरको धारण करने या सुरक्षित रखनेकी शक्ति नहीं है। इसे तो मैंने ही अपनेको (प्राण, अपान, समान, व्यान और उदानरूप) पाँच भागोंमें विभक्त करके आश्रय देते हुए धारण कररक्खा है और मुझसे ही यह सुरक्षित है।' प्राणकी यह बात सुनकर भी उन देवताओंने उसपर विश्वास नहीं किया वे अविश्वासी ही बने रहे ॥ ३ ॥ सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥ सः = (तब) वह प्राण अभिमानात् = अभिमानपूर्वक ऊर्ध्वम् उत्क्रमते इव = मानो (उस शरीरसे) ऊपरकी ओर बाहर निकलने लगा; तस्मिन् उत्क्रामति = उसके बाहर निकलनेपर, अथ इतरे सर्वे एव = उसीके साथ-ही-साथ अन्य सब भी उत्क्रामन्ते च = शरीरसे बाहर निकलने लगे और तस्मिन् प्रतिष्ठमाने = (शरीरमे लौटकर) उसके ठहर जानेपर; सर्वे एव प्रातिष्ठन्ते = और सब देवता भी ठहर गये तत् यथा = तत्र जैसे (मधुके छत्तेसे); मधुकरराजानम् = मधु- मक्खियोंके राजाके उत्क्रामन्तम् = निकलनेपर उसीके साथ-साथ सर्वाः एव = सारी ही मक्षिकाः = मधुमक्खियाँ, उत्क्रामन्ते = बाहर निकल जाती हैं च तस्मिन् = और उसके प्रतिष्ठमाने = बैठ जानेपर सर्वाः एव = सब-की-सत्र, प्रातिष्ठन्ते = बैठ जाती हैं एवम् = ऐसी ही दशा (इन सबकी हुई) वाक् चक्षुः श्रोत्रम् च मनः = अतः वाणी, नेत्र, श्रोत्र और मन; ते = वे (सभी) प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति = (प्राणकी श्रेष्ठताका अनुभव करके) प्रसन्न होकर प्राणकी स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥ व्याख्या—तत्र उनको अपना प्रभाव दिखलाकर सावधान करनेके लिये वह सर्वश्रेष्ठ प्राण अभिमानमें ठेस लगनेसे मानो रूठकर इस शरीरसे बाहर निकलनेके लिये ऊपरकी ओर उठने लगा। फिर तो सब-के-सब देवता विवश होकर उसीके साथ बाहर निकलने लगे कोई भी स्थिर नहीं रह सका। जब वह पुन लौटकर अपने स्थानपर स्थित हो गया, तब अन्य सब भी स्थित हो गये। जैसे मधुमक्खियोंका राजा जब अपने स्थानसे उड़ता है तब उसके साथ ही वहाँ बैठी हुई अन्य सब मधु- मक्खियाँ भी उड़ जाती हैं, और जब वह बैठ जाता है तो अन्य सब भी बैठ जाती हैं ऐसी ही दशा इन सब वागादि देवताओंकी भी हुई। यह देखकर वागी चक्षु श्रोत्र आदि सब इन्द्रियोंको और मन आदि अन्तःकरणकी वृत्तियोंको भी यह विश्वास हो गया कि हम सबमें प्राण ही श्रेष्ठ है' अतः वे सब प्रसन्नतापूर्वक निम्न प्रकारने प्राणकी स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—प्राणको ही प्रत्यक्ष परमेश्वरका स्वरूप मानकर उपासना करनेके लिये उमरा मर्वरूपसे महत्त्व बतलाया जाता है— एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः । एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५॥ एषः अग्निः तपति = यह प्राण अग्निरूपसे तपता है एषः सूर्यः = यही सूर्य है, एषः पर्जन्यः = यही मेघ है, (एषः) मघवान् = यही इन्द्र है एषः वायुः = यही वायु है (तथा) एषः देवः = यह प्राणरूप देव ही; पृथिवी = पृथिवी (एव), रयिः = रयि है' (तथा) यत् = जो कुछ, सत् = सन्, च = और, असत् = असत् है, च = तथा, [यत् = जो ] अमृतम् = अमृत कहा जाता है, वह भी है ॥ ५॥