कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 265, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें~ प्रश्नोपनिषद् * २४१ जिनका जीवन सत्यमय है तथा जो सत्यस्वरूप परमेश्वरको अपने हृदयमे नित्य स्थित देखते हे, उन्हींको वह ब्रह्मलोक ( परम पद, परमगति ) मिलता है, दूसरोंको नहीं ॥ १५ ॥ तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥ येषु न=जिनमें न तो, जिह्मम्=कुटिलता ( और ), अनृतम्=झूठ है; च न=तथा न, माया=माया ( कपट ) ही है, तेषाम्=उन्हींको; असौ=वह, विरजः=विशुद्ध, विकाररहित, ब्रह्मलोकः इति=ब्रह्मलोक ( मिलता है ) ॥ १६ ॥ व्याख्या-जिनमे कुटिलताका लेश भी नहीं है, जो स्वप्ने भी मिथ्या-भाषण नहीं करते और असत्यमय आचरणसे सदा दूर रहते हैं, जिनमे राग-द्वेषादि विकारोका सर्वथा अभाव है, जो सब प्रकारके छल-कपटसे शून्य हैं, उन्हींको वह विशुद्ध विकाररहित ब्रह्मलोक मिलता है । जो इनसे विपरीत लक्षणोवाले हैं, उनको नहीं मिलता ॥ १६ ॥ ॥ प्रथम प्रश्न समाप्त ॥ १ ॥ +++ द्वितीय प्रश्न अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥ अथ ह एनम्=इसके पश्चात् इन प्रसिद्ध ( महात्मा पिप्पलाद ) ऋषिसे, वैदर्भिः भार्गवः=विदर्भदेशीय भार्गवने; पप्रच्छ=पूछा, भगवन्=भगवन्, कति देवाः एव=कुल कितने देवता, प्रजां विधारयन्ते=प्रजाको धारण करते हैं; कतरे एतत्=उनमेंसे कौन-कौन इसे, प्रकाशयन्ते=प्रकाशित करते हे; पुनः=फिर ( यह भी बतलाइये कि), एषाम्= इन सबमें; कः=कौन; वरिष्ठः=सर्वश्रेष्ठ है; इति=यही ( मेरा प्रश्न है ) ॥ १ ॥ व्याख्या-इन भार्गव ऋषि महर्षि पिप्पलादसे तीन बातें पूछी हैं- ( १ ) प्रजाको यानी प्राणियोंके शरीरको धारण करनेवाले कुल कितने देवता हैं ? ( २ ) उनमेंसे कौन-कौन इसको प्रकाशित करनेवाले हैं ? ( ३ ) इन सबमें अत्यन्त श्रेष्ठ कौन है ? ॥ १ ॥ तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्या- भिवदन्ति वयमेतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥ सः ह=उन प्रसिद्ध महर्षि (पिप्पलाद) ने, तस्मै उवाच=उन भार्गवने कहा; ह आकाशः वै=निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश, एषः देवः=यह देवता है ( तथा ), वायुः=वायु, अग्निः=अग्नि; आपः=जल; पृथिवी=पृथ्वी, वाक्=वाणी ( कर्मेन्द्रियाँ); चक्षुः च श्रोत्रम् मनः=नेत्र और श्रोत्र ( ज्ञानेन्द्रियाँ ) तथा मन (अन्तःकरण ) भी [ देवता हैं ]; ते प्रकाश्य=वे सब (अपनी-अपनी शक्ति ) प्रकट करके, अभिवदन्ति=अभिमानपूर्वक कहने लगे; वयम् एतत् बाणम्= हमने इस शरीरको, अवष्टभ्य=आश्रय देकर, विधारयामः=धारण कर रक्खा है ॥ २ ॥ व्याख्या-इस प्रकार भार्गवके पूछनेपर महर्षि पिप्पलाद उत्तर देते हैं । यहाँ दो प्रश्नोंका उत्तर एक ही साथ दे दिया गया है । वे कहते हैं कि सबका आधार तो वैसे आकाशरूप देवता ही है, परतु उससे उत्पन्न होनेवाले वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-ये चारों महाभूत भी शरीरको धारण किये रहते हैं । यह स्थूलशरीर इन्हींसे बना है । इसलिये ये धारक देवता हैं । वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एव मन आदि अन्तःकरण-ये चौदह देवता इस शरीरके प्रकाशक हैं । ये देवता देहको धारण और प्रकाशित करते हैं, इसलिये ये प्रकाशक देवता कहलाते हैं। ये इस देहको प्रकाशित करके आपसमें झगड़ पड़े और अभिमानपूर्वक परस्पर कहने लगे कि 'हमने इस शरीरको आश्रय देकर धारण कर रक्खा है' ॥ २ ॥ उ० अं० ३१-