भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

२४० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥ अहोरात्रः वै=दिन और रातका जोड़ा ही, प्रजापतिः = प्रजापति है; तस्य = उसका; अहः एव= दिन ही; प्राणः = प्राण है (और); रात्रिः एव = रात्रि ही; रयिः = रयि है; ये दिवा = ( अतः ) जो दिनमे; रत्या संयुज्यन्ते = स्त्री- सहवास करते हैं; एते= ये लोग; वै प्राणम् = सचमुच अपने प्राणोको ही; प्रस्कन्दन्ति = क्षीण करते हैं तथा (मनुष्य); यत् रात्रौ = जो रात्रिमें; रत्या संयुज्यन्ते = स्त्री-सहवास करते हैं; तत् ब्रह्मचर्यम् एव = वह ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥ व्याख्या - इस मन्त्रमें दिन और रात्रिरूप चौबीस घंटेके कालरूपमे परमेश्वरके स्वरूपकी कल्पना करके जीवनोपयोगी कर्मोंका रहस्य समझाया गया है। भाव यह है कि ये दिन और रात मिलकर जगत्पति परमेश्वरका पूर्णरूप हैं। उसका यह दिन तो मानो प्राण अर्थात् सबको जीवन देनेवाला प्रकाशमय विशुद्ध स्वरूप है और रात्रि ही भोगरूप रयि है। अतः जो मनुष्य दिनमे स्त्री-प्रसङ्ग करते है अर्थात् परमात्माके विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त करनेकी इच्छासे प्रकाशमय मार्गमें चलना प्रारम्भ करके भी स्त्री-प्रसङ्ग आदि विलासमे आसक्त हो जाते है, वे अपने लक्ष्यतक न पहुँचकर इस अमूल्य जीवनको व्यर्थ खो देते हैं। उनसे भिन्न जो सासारिक उन्नति चाहनेवाले हैं, वे यदि शास्त्रके नियमानुसार ऋतुकालमे रात्रिके समय नियमानुकूल स्त्री-प्रसङ्ग करते है तो वे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करनेके कारण ब्रह्मचारीके तुल्य ही हैं। लौकिक दृष्टिसे यों कह सकते हैं कि इस मन्त्रमे गृहस्थोको दिनमे स्त्री-प्रसङ्ग कदापि न करनेका और विहित रात्रियोंमें शास्त्रानुसार नियमित और संयमितरूपमें केवल सन्तानकी इच्छासे करनेका उपदेश दिया गया है। तभी वह ब्रह्मचर्यकी गणनामे आ सकता है* ॥ १३ ॥ अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥ अन्नम् वै = अन्न ही; प्रजापतिः = प्रजापति है; ह ततः वै = क्योंकि उसीसे; तत् रेतः = वह वीर्य ( उत्पन्न होता है ), तस्मात् = उस वीर्यसे, इमाः प्रजाः = ये सम्पूर्ण चराचर प्राणी; प्रजायन्ते इति = उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या- इस मन्त्रमें अन्नको प्रजापतिका स्वरूप बताकर अन्नकी महिमा बतलाते हुए कहते हैं कि यह सब प्राणियोंका आहाररूप अन्न ही प्रजापति है, क्योंकि इसीसे वीर्य उत्पन्न होता है और वीर्यसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। इस कारण इस अन्नको भी प्रकारान्तरसे प्रजापति माना गया है ॥ १४ ॥ सम्बन्ध- अब पहले बतलाये हुए दो प्रकारके साधकोंको मिलनेवाले पृथक्-पृथक् फलका वर्णन करते हैं- तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ तत् ये ह वै = जो कोई भी निश्चयपूर्वक; तत् प्रजापतिव्रतम् = उस प्रजापति-व्रतका; चरन्ति = अनुष्ठान करते हैं; ते मिथुनम् = वे जोड़ेको; उत्पादयन्ते = उत्पन्न करते हैं; येषाम् तपः = जिनमें तप ( और ); ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्य (है); येषु सत्यम् = जिनमें सत्य; प्रतिष्ठितम् = प्रतिष्ठित है; तेषाम् एव = उन्हींको; एषः ब्रह्मलोकः = यह ब्रह्मलोक मिलता है ॥ १५ ॥ व्याख्या-जो लोग सन्तानोत्पत्तिरूप प्रजापतिके व्रतका अनुष्ठान करते हैं अर्थात् स्वर्गादि लोकोके भोगकी प्राप्तिके लिये शास्त्रविहित शुभ कर्मोंका आचरण करते हुए नियमानुसार स्त्री-प्रसङ्ग आदि भोगोंका उपभोग करते हैं, वे तो पुत्र और कन्यारूप जोड़ेको उत्पन्न करके प्रजाकी वृद्धि करते हैं। और जो उनसे भिन्न हैं, जिनमे ब्रह्मचर्य और तप भरा हुआ है,

  • रजोदर्शनके दिनसे लेकर सोलह दिनोंतक स्वाभाविक ऋतुकाल कहलाता है। इनमें पहली चार रात्रियों तथा ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रियों सर्वथा वर्जित हैं। शेष दस रात्रियोंमें पर्व- ( एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, ग्रहण, व्यतीपात, सक्रान्ति, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, रामनवमी आदि ) दिनोंको छोड़कर पत्नीकी रतिकामनासे जो पुरुष महीनेमें केवल दो रात्रि स्त्री-सहवास करता है, वह गृहस्थाश्रममें रहता हुआ ही ब्रह्मचारी माना जाता है। ( मनुस्मृति ३ । ४५-४७, ५०)