कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो जाते हैं। यह सूर्य ही समस्त जगत्के प्राणोंका केन्द्र है। यही अमृत—अविनाशी और निर्भय पद है। यही परम गति है। इसे प्राप्त हुए महापुरुष फिर लौटकर नहीं आते। यह निरोध अर्थात् पुनर्जन्मको रोकनेवाला- आत्यन्तिक प्रलय है। इस मन्त्रमें सूर्यको परमेश्वरका स्वरूप मानकर ही सब बातें कही गयी हैं। इसी बातको अगले मन्त्रमे स्पष्ट किया गया है ॥ १० ॥ पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥ (कितने ही लोग तो इस सूर्यको)—पञ्चपादम् = पाँच चरणोंवाला; पितरम् = सबका पिता; द्वादशाकृतिम् = बारह आकृतियोंवाला; पुरीषिणम् = जलका उत्पादक; दिवः परे अर्धे = (और) स्वर्गलोकसे भी ऊपरके स्थानमें (स्थित), आहुः = बतलाते हैं; अथ इमे = तथा ये; अन्ये उ = दूसरे कितने ही लोग; परे = विशुद्ध; सप्तचक्रे = सात पहियोंवाले (और); षडरे = छः अरोंवाले (रथमे); अर्पितम् = बैठा हुआ (एव); विचक्षणम् = सबको भलीभाँति जाननेवाला है, इति आहुः = ऐसा बतलाते हैं ॥ ११ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरके प्रत्यक्ष—दृष्टिगोचर स्वरूप इस सूर्यके विषयमें कितने ही तत्त्ववेत्ता तो यों कहते हैं कि इसके पाँच पैर हैं। अर्थात् छः ऋतुओंमेंसे हेमन्त और शिशिर—इन दो ऋतुओंकी एकता करके पाँच ऋतुओंको ने इस सूर्यके पाँच चरण बतलाते हैं; तथा यह भी कहते हैं कि बारह महीने ही इसकी बारह आकृतियों अर्थात् बारह शरीर हैं। इसका स्थान स्वर्गलोकसे भी ऊँचा है। स्वर्गलोक भी इसीके आलोकसे प्रकाशित है। इस लोकमें जो जल बरसता है, उस जलकी उत्पत्ति इसीसे होती है। अतः सबको जलरूप जीवन प्रदान करनेवाला होनेसे यह सबका पिता है। दूसरे ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि लाल, पीले आदि सात गाँकी किरणोंसे युक्त तथा वसन्त आदि छः ऋतुओंके हेतुभूत इस विशुद्ध प्रकाशमय सूर्यमण्डलमें—जिसे सात चक्र एव छः अरोंवाला रथ कहा गया है—बैठा हुआ इसका आत्मारूप, सबको भलीभाँति जाननेवाला सर्वज्ञ परमेश्वर ही उपास्य है। यह स्थूल नेत्रोंसे दिखायी देनेवाला सूर्यमण्डल उसका शरीर है। इसलिये यह उसीकी महिमा है ॥ ११ ॥ मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः : प्राणस्तस्मादेत : शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥ मासः वै = महीना ही; प्रजापतिः = प्रजापति है; तस्य = उसका; कृष्णपक्षः एव = कृष्णपक्ष ही; रयिः = रयि है और; शुक्लः प्राणः = शुक्लपक्ष प्राण है; तस्मात् = इसलिये; एते ऋषयः = ये (कल्याणकामी) ऋषिगण; शुक्ले = शुक्ल- पक्षमे (निष्कामभावसे), इष्टम् = यज्ञादि कर्तव्य-कर्म; कुर्वन्ति = किया करते हैं; (तथा) इतरे = दूसरे (जो सांसारिक भोगोंको चाहते हैं); इतरस्मिन् = दूसरे पक्षमे—कृष्णपक्षमें (सकामभावसे यज्ञादि शुभकर्मोंका अनुष्ठान किया करते हैं) ॥ १२ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें महीनेको प्रजापतिका रूप देकर परमेश्वरकी कर्मोंद्वारा उपासना करनेका रहस्य बताया गया है। भाव यह है कि प्रत्येक महीना ही मानो प्रजापति है, उसमें कृष्णपक्षके पंद्रह दिन तो उस परमात्माका दाहिना अङ्ग हैं; इसे रयि (स्थूलभूत-समुदायका कारण) समझना चाहिये। यह उस परमेश्वरका शक्तिस्वरूप भोगमय रूप है। और शुक्ल- पक्षके पंद्रह दिन ही मानो उत्तर अङ्ग हैं। यही प्राण अर्थात् सबको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्माका सर्वान्तर्यामी रूप है। इसलिये जो कल्याणकामी ऋषि हैं, अर्थात् जो रयिस्थानीय भोग-पदार्थोंसे विरक्त होकर प्राणस्थानीय सर्वात्मरूप परब्रह्म- को चाहनेवाले हैं, वे अपने समस्त शुभ कर्मोंको शुक्लपक्षमें करते हैं अर्थात् शुक्लपक्षस्थानीय प्राणाधार परब्रह्म परमेश्वरके अर्पण करके करते हैं—स्वय उसका कोई फल नहीं चाहते, यही गीतोक्त कर्मयोग है। इनसे भिन्न जो भोगासक्त मनुष्य हैं, वे कृष्णपक्षमे अर्थात् कृष्णपक्ष-स्थानीय स्थूल पदार्थोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सब प्रकारके कर्म किया करते हैं। इनका वर्णन गीतामें 'स्वर्गपराः' के नामसे हुआ है (गीता २। ४२—४४) ॥ १२ ॥