भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 262

२३८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च। तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥ संवत्सरः वै=संवत्सर (बारह महीनोंवाला काल) ही; प्रजापतिः=प्रजापति है; तस्य अयने=उसके दो अयन हैं-, दक्षिणम् च=एक दक्षिण और; उत्तरम् च=दूसरा उत्तर, तत् ये ह=वहाँ मनुष्योंमें जो लोग निश्चयपूर्वक; तत् इष्टापूर्ते वै= (केवल) उन इष्ट और पूर्त कर्मोंको ही, कृतम् इति=करने योग्य कर्म मानकर (सकाम भावसे), उपासते= उनकी उपासना करते हैं (उन्हींके अनुष्ठानमें लगे रहते हैं), ते चान्द्रमसम् = वे चन्द्रमाके; लोकम् एव=लोकको ही; अभिजयन्ते=जीतते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं (और); ते एव=वे ही, पुनः आवर्तन्ते=पुनः (वहाँसे) लौटकर आते हैं, तस्मात् एते= इसलिये ये, प्रजाकामाः ऋषयः = सन्तानकी कामनावाले ऋषिगण, दक्षिणम् प्रतिपद्यन्ते= दक्षिण (मार्ग) को प्राप्त होते हैं; ह एषः वै रयिः = निस्सन्देह यही वह रयि है; य. पितृयाणः = जो 'पितृयान' नामक मार्ग है ॥ ९॥ व्याख्या- इस मन्त्रमें संवत्सरको परमात्माका प्रतीक बताकर उसके रयिस्थानीय भोग्य पदार्थोंकी उपासना और उसका फल बताते हैं। भाव यह है कि बारह महीनोंका यह संवत्सररूप काल ही मानो सृष्टिके स्वामी परमेश्वरका स्वरूप है। इसके दो अयन हैं - दक्षिण और उत्तर । दक्षिणायनके जो छः महीने हैं, जिनमें सूर्य दक्षिणकी ओर घूमता है - ये मानो इसके दक्षिण अङ्ग हैं और उत्तरायणके छः महीने ही उत्तर अङ्ग हैं। उनमें उत्तर अङ्ग तो प्राण है अर्थात् इस विश्वके आत्मारूप उस परमेश्वरका सर्वान्तर्यामी स्वरूप है और दक्षिण अङ्ग रयि अर्थात् उसका बाह्य भोग्य स्वरूप है। इस जगत्में जो सन्तानकी कामनावाले ऋषि स्वर्गादि सांसारिक भोगोंमें आसक्त हैं, वे यज्ञादिद्वारा देवताओंका पूजन करना, ब्राह्मण एव श्रेष्ठ पुरुषोंका धनादिसे सत्कार करना, दुखी प्राणियोंकी सेवा करना आदि इष्टकर्म तथा कुँआ, बावली, तालाब, बगीचा, धर्मशाला, विद्यालय, औषधालय, पुस्तकालय आदि लोकोपकारी चिरस्थायी स्मारकोंकी स्थापना करना आदि पूर्तकर्मोंको श्रेष्ठ समझते हैं और इनके फलस्वरूप इस लोक तथा परलोकके भोगोंके उद्देश्यसे इनकी उपासना अर्थात् विधिवत् अनुष्ठान करते हैं, यह उस संवत्सररूप परमेश्वरके दक्षिण अङ्गकी उपासना है। इसीको ईशावास्य-उपनिषद्में असम्भूतिकी उपासनाके नामसे देव, पितर, मनुष्य आदि शरीरोंकी सेवा बताया है। इसके प्रभावसे वे चन्द्रलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अपने कर्मोंका फल भोगकर पुनः इस लोकमें लौट आते हैं, यही पितृयाण मार्ग है ॥ ९ ॥ अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामा- यतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १० ॥ अथ= किंतु (जो), तपसा = तपस्याके साथ; ब्रह्मचर्येण = ब्रह्मचर्यपूर्वक (और); श्रद्धया = श्रद्धासे युक्त होकर; विद्यया = अध्यात्मविद्याके द्वारा; आत्मानम् = (सूर्यरूप) परमात्माकी; अन्विष्य = खोज करके (जीवन सार्थक करते हैं, वे); उत्तरेण = उत्तरायण-मार्गसे, आदित्यम् = सूर्यलोकको; अभिजयन्ते = जीत लेते हैं (प्राप्त करते हैं), एतत् वै=यह (सूर्य) ही, प्राणानाम् = प्राणों का, आयतनम् = केन्द्र है, एतत् अमृतम् = यह अमृत (अविनाशी) और, अभयम् = निर्भय पद है, एतत् परायणम् = यह परमगति है, एतस्मात् = इससे, न पुन. आवर्तन्ते = पुनः लौटकर नहीं आते, इति एषः = इस प्रकार यह, निरोधः = निरोध (पुनरावृत्तिका निवारक) है, तत् एषः = इस बात को स्पष्ट करनेवाला यह (अगला), श्लोकः = श्लोक है ॥ १० ॥ व्याख्या - उपर्युक्त सकाम उपासकोंसे भिन्न जो कल्याणकामी साधक हैं, वे इन सांसारिक भोगोंकी अनित्यता और दुःखरूपताको समझकर इनसे सर्वथा विरक्त हो जाते हैं। वे श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सयमके साथ त्यागमय जीवन बिताते हैं और अध्यात्मविद्याके द्वारा अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले किसी भी अनुकूल साधनद्वारा सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरकी निष्काम उपासना करते हैं। यह मानो उस संवत्सररूप प्रजापतिके उत्तर अङ्गकी उपासना है। इसको ईशावास्य-उपनिषद्में सम्भूतिकी उपासना कहा है। इसके उपासक उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकमे जाकर सूर्यके आत्मारूप