भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 832 में से

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पृष्ठ 260

२३६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—महर्षि पिप्पलादकी आज्ञा पाकर वे लोग श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वहीं तपश्चर्या करने लगे। महर्षिकी देखरेखमें संयमपूर्वक रहकर एक वर्षतक उन्होंने त्यागमय जीवन बिताया। उसके बाद वे सब पुनः पिप्पलाद ऋषिके पास गये तथा उनमेंसे सर्वप्रथम कत्यऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने श्रद्धा और विनयपूर्वक पूछा—'भगवन् ! जिससे ये सम्पूर्ण चराचर जीव नाना रूपोंमें उत्पन्न होते हैं, जो इनका सुनिश्चित परम कारण है, वह कौन है ?' ॥ ३ ॥ तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पाद॑यते । रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥ तस्मै सः ह उवाच=उससे वे प्रसिद्ध महर्षि बोले—; वै प्रजाकामः = निश्चय ही प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छावाला (जो); प्रजापतिः =प्रजापति है, सः तपः अतप्यत =उसने तप किया; स तपः तप्त्वा=उसने तपस्या करके (सृष्टि आरम्भ की, उस समय पहले); सः=उसने; रयिम् च = एक तो रयि (चन्द्रमा) तथा; प्राणम् च= दूसरा प्राण (सूर्य) भी; इति मिथुनम्= यह जोड़ा; उत्पादयेते=उत्पन्न किया, एतौ मे=(इन्हें उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था) कि ये (दोनों मिलकर) मेरी; बहुधा=नाना प्रकारकी; प्रजाः=प्रजाओंको, करिष्यतः इति=उत्पन्न करेंगे ॥ ४ ॥ व्याख्या—कबन्धी ऋषिका यह प्रश्न सुनकर महर्षि पिप्पलाद बोले-हे कात्यायन ! यह बात वेदोंमें प्रसिद्ध है कि सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी परमेश्वरको सृष्टिके आदिमें जब प्रजा उत्पन्न करनेकी इच्छा हुई तो उन्होंने सङ्कल्परूप तप किया । तपसे उन्होंने सर्वप्रथम रयि और प्राण-इन दोनोंका एक जोड़ा उत्पन्न किया । उसे उत्पन्न करनेका उद्देश्य यह था कि ये दोनों मिलकर मेरे लिये नाना प्रकारकी सृष्टि उत्पन्न करेंगे । इस मन्त्रमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली जो समष्टि जीवनी-शक्ति है, उसे ही 'प्राण' नाम दिया गया है। इस जीवनी शक्तिसे ही प्रकृतिके स्थूल स्वरूपमें-समस्त पदार्थोंमें जीवन, स्थिति और यथा- योग्य सामञ्जस्य आता है एव स्थूल भूत समुदायका नाम 'रयि' रक्खा गया है, जो प्राणरूप जीवनी शक्तिसे अनुप्राणित होकर कार्यक्षम होता है । प्राण चेतना है, रयि शक्ति या आकृति है। धनात्मक और ऋणात्मक दो तत्त्वोंकी भाँति प्राण और रयिक संयोगसे ही सृष्टिका समस्त कार्य सम्पन्न होता है। इन्हींको अन्यत्र अग्नि और सोमके एव पुरुष तथा प्रकृतिके नामसे भी कहा गया है ॥ ४ ॥ आदित्यो ह वैप्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥५॥ ह=यह निश्चय है कि; आदित्यः वै=सूर्य ही; प्राणः =प्राण हैं (और); चन्द्रमाः एव =चन्द्रमा ही; रयिः= रयि है; यत् मूर्तम् च=जो कुछ आकारवाला है (पृथ्वी, जल और तेज); अमूर्तम् च=और जो आकाररहित है (आकाश और वायु), एतत् सर्वम् वै=यह सभी कुछ; रयिः =रयि है; तस्मात्=इसलिये; मूर्तिः एव =मूर्तमात्र ही अर्थात् देखने तथा जाननेमें आनेवाली सभी वस्तुएँ, रयिः=रयि हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—इस मन्त्रमें उपर्युक्त प्राण और रयिका स्वरूप समझाया गया है। पिप्पलाद कहते हैं कि यह दीखनेवाला सम्पूर्ण जगत् प्राण और रयि-इन दोनो तत्त्वोंके संयोग या सम्मिश्रणसे बना है, इसलिये यद्यपि इन्हें पृथक् पृथक् करके नहीं बताया जा सकता, तथापि तुम इस प्रकार समझो-यह सूर्य, जो हमें प्रत्यक्ष दिखलायी देता है, यही प्राण है, क्योंकि इसीमें सबको जीवन प्रदान करनेवाली चेतना-शक्तिकी प्रधानता और अधिकता है। यह सूर्य उस सूक्ष्म जीवनी शक्तिका घनीभूत स्वरूप है। उसी प्रकार यह चन्द्रमा ही 'रयि' है, क्योंकि इसमें स्थूल तत्त्वोंको पुष्ट करनेवाली भूत तन्मात्राओंकी ही अधिकता है। समस्त प्राणियोंके स्थूल शरीरोंका पोषण इस चन्द्रमाकी शक्तिको पाकर ही होता है। हमारे शरीरोंमें ये दोनों शक्तियाँ प्रत्येक अङ्ग प्रत्यङ्गमें व्याप्त हैं। उनमें जीवनी शक्तिका सम्बन्ध सूर्यसे है और मास, मेद आदि स्थूल तत्त्वोका सम्बन्ध चन्द्रमासे है॥५॥ अथादित्य उद्यन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते । यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥