कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 259
- प्रश्नोपनिषद् * २३५ प्रथम प्रश्न ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैव्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥ ॐ = ॐ इस परमात्माके नामका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ करते हैं; भारद्वाजः सुकेशा = भरद्वाज-पुत्र सुकेशा; च शैब्यः सत्यकामः = और शिविकुमार सत्यकाम; च गार्ग्यः सौर्यायणी = तथा गर्ग-गोत्रमे उत्पन्न सौर्यायणी; च कौसल्यः आश्वलायनः = एव कोसलदेशीय आश्वलायन; च वैदर्भिः भार्गवः = तथा विदर्भनिवासी भार्गव; ( च ) कात्यायनः कबन्धी = और कत्य ऋषिका प्रपौत्र कबन्धी; ते एते ह ब्रह्मपराः = ये ये छः प्रसिद्ध ऋषि जो कि वेदपरायण (और); ब्रह्मनिष्ठाः = वेदमें निष्ठा रखनेवाले थे; ते ह = वे सब-के-सब; परम् ब्रह्म = परब्रह्मकी; अन्वेषमाणाः = खोज करते हुए; एषः ह वै तत् सर्वम् वक्ष्यति इति = यह समझकर कि ये (पिप्पलाद ऋषि) निश्चय ही उस ब्रह्मके विषयमे सारी बातें बतायेंगे; समित्पाणयः = हाथमे समिधा लिये हुए; भगवन्तम् पिप्पलादम् उपसन्नाः = भगवान् पिप्पलाद ऋषिके पास गये ॥ १ ॥ व्याख्या-ओंकारस्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माका स्मरण करके उपनिषद्का आरम्भ किया जाता है । प्रसिद्ध है कि भरद्वाजके पुत्र सुकेशा, शिविकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्रमे उत्पन्न सौर्यायणी, कोसलदेश-निवासी आश्वलायन, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्यके प्रपौत्र कबन्धी—ये वेदाभ्यासके परायण और ब्रह्मनिष्ठ अर्थात् श्रद्धापूर्वक वेदानुकूल आचरण करनेवाले थे । एक बार ये छहों ऋषि परब्रह्म परमेश्वरकी जिज्ञासासे एक साथ बाहर निकले । इन्होंने सुना था कि पिप्पलाद ऋषि इस विषयको विशेषरूपसे जानते हैं, अतः यह सोचकर कि 'परब्रह्मके सम्बन्धमे हम जो कुछ जानना चाहते हैं, वह सब वे हमें बता देंगे' वे लोग जिज्ञासुके वेषमे हाथमे समिधा लिये हुए महर्षि पिप्पलादके पास गये ॥ १ ॥ तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥ तान् सः ह = उन सुकेशा आदि ऋषियोंसे वे प्रसिद्ध, ऋषिः उवाच = (पिप्पलाद) ऋषि बोले—; भूयः एव = तुमलोग पुनः; श्रद्धया = श्रद्धाके साथ; ब्रह्मचर्येण = ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए; (और) तपसा = तपस्यापूर्वक, संवत्सरम् = एक वर्षतक (यहाँ); संवत्स्यथ = भलीभाँति निवास करो, यथाकामम् = (उसके बाद) अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार; प्रश्नान् पृच्छत = प्रश्न पूछना; यदि विज्ञास्यामः = यदि (तुम्हारी पूछी हुई बातोंको) मैं जानता होऊँगा; ह सर्वम् = तो निस्सन्देह वे सब बातें, वः वक्ष्यामः इति = तुमलोगोंको बताऊँगा ॥ २ ॥ व्याख्या—उपर्युक्त छहों ऋषियोंको परब्रह्मकी जिज्ञासासे अपने पास आया देखकर महर्षि पिप्पलादने उनसे कहा— तुमलोग तपस्वी हो, तुमने ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक साङ्गोपाङ्ग वेद पढे हैं, तथापि मेरे आश्रममे रहकर पुनः एक वर्षतक श्रद्धा- पूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तपश्चर्या करो । उसके बाद तुमलोग जो चाहो, मुझसे प्रश्न करना । यदि तुम्हारे पूछे हुए विषयका मुझे ज्ञान होगा तो निस्सन्देह तुम्हें सब बातें भलीभाँति समझाकर बतलाऊँगा ॥ २ ॥ सम्बन्ध-ऋषिके आज्ञानुसार सबने श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्याके साथ विधिपूर्वक एक वर्षतक वहाँ निवास किया । अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥ अथ = तदनन्तर (उनमेसे); कात्यायनः कबन्धी = कत्य ऋषिके प्रपौत्र कबन्धीने; उपेत्य = (पिप्पलाद ऋषिके) पास जाकर; पप्रच्छ = पूछा—, भगवन् = भगवन् !, कुतः ह वै = किस प्रसिद्ध और सुनिश्चित कारणविशेषसे; इमाः प्रजाः = यह सम्पूर्ण प्रजा, प्रजायन्ते = नाना रूपोंमें उत्पन्न होती है, इति = यह मेरा प्रश्न है ॥ ३ ॥