भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 832 में से

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पृष्ठ 258

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ प्रश्नोपनिषद् प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेदके पिप्पलाद शाखीय ब्राह्मणभागके अन्तर्गत है। इस उपनिषद्मे पिप्पलाद ऋषिने सुकेशा आदि छः ऋषियोंके छः प्रश्नोंका क्रमसे उत्तर दिया है, इसलिये इसका नाम प्रश्नोपनिषद् हो गया। शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! देवाः=हे देवगण !; (वयम्) यजत्राः (सन्तः)=हम भगवान्‌का यजन (आराधन) करते हुए, कर्णेभिः= कानोंसे, भद्रम्=कल्याणमय वचन, शृणुयाम=सुनें, अक्षभिः=नेत्रोंसे; भद्रम्=कल्याण (ही), पश्येम=देखें, स्थिरैः=सुदृढ; अङ्गैः=अङ्गों, तनूभिः=एव शरीरसे, तुष्टुवांसः (वयम्)=भगवान्‌की स्तुति करते हुए हमलोग; यत्=जो; आयुः= आयु, देवहितम्=आराध्यदेव परमात्माके काम आ सके; (तत्)=उसका; व्यशेम=उपभोग करें, वृद्धश्रवाः=सब ओर फैले हुए सुयशवाले, इन्द्रः=इन्द्र, नः=हमारे लिये; स्वस्ति दधातु=कल्याणका पोषण करें, विश्ववेदाः=सम्पूर्ण विश्वका ज्ञान रखनेवाले, पूषा=पूषा; नः=हमारे लिये; स्वस्ति (दधातु)=कल्याणका पोषण करें;, अरिष्टनेमिः=अनिष्टोंको मिटानेके लिये चक्रसदृश शक्तिशाली, तार्क्ष्यः=गरुड़देव, नः=हमारे लिये; स्वस्ति (दधातु)=कल्याणका पोषण करें; [ तथा=तथा, ] बृहस्पतिः=(बुद्धिके स्वामी) बृहस्पति भी; नः=हमारे लिये, स्वस्ति (दधातु)=कल्याणकी पुष्टि करें; ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः=परमात्मन् ! हमारे त्रिविध तापकी शान्ति हो। व्याख्या—गुरुके यहाँ अध्ययन करनेवाले शिष्य अपने गुरु, सहपाठी तथा मानवमात्रका कल्याण-चिन्तन करते हुए देवताओंसे प्रार्थना करते हैं कि 'हे देवगण ! हम अपने कानोंसे शुभ—कल्याणकारी वचन ही सुनें। निन्दा, चुगली, गाली या दूसरी दूसरी पापकी बातें हमारे कानोंमें न पड़ें और हमारा अपना जीवन यजन-परायण हो—हम सदा भगवान्‌की आराधनामें ही लगे रहें। न केवल कानोंसे सुनें, नेत्रोंसे भी हम सदा कल्याणका ही दर्शन करें। किसी अमङ्गलकारी अथवा पतनकी ओर ले जानेवाले दृश्योंकी ओर हमारी दृष्टिका आकर्षण कभी न हो। हमारा शरीर, हमारा एक-एक अवयव सुदृढ एव सुपुष्ट हो—वह भी इसलिये कि हम उनके द्वारा भगवान्‌का स्तवन करते रहें। हमारी आयु भोग-विलास या प्रमादमें न- बीते। हमें ऐसी आयु मिले, जो भगवान्‌के कार्यमें आ सके। [ देवता हमारी प्रत्येक इन्द्रियमें व्याप्त रहकर उसका संरक्षण और सञ्चालन करते हैं। उनके अनुकूल रहनेसे हमारी इन्द्रियाँ सुगमतापूर्वक सन्मार्गमें लगी रह सकती हैं, अत. उनसे प्रार्थना करनी उचित ही है। ] जिनका सुयश सब ओर फैला है, वे देवराज इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनिवारक तार्क्ष्य (गरुड़) और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति—ये सभी देवता भगवान्‌की दिव्य विभूतियाँ हैं। ये सदा हमारे कल्याणका पोषण करें। इनकी कृपासे हमारे साथ प्राणिमात्रका कल्याण होता रहे। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—सभी प्रकारके तापोंकी शान्ति हो।