भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 257
  • कठोपनिषद् * २३३ मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् । ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥१८॥ अथ=इस प्रकार उपदेश सुननेके अनन्तर; नचिकेता=नचिकेता; मृत्युप्रोक्ताम्=यमराजद्वारा बतलायी हुई; एताम्=इस; विद्याम् च=विद्याको और; कृत्स्नम्=सम्पूर्ण; योगविधिम्=योगकी विधिको; लब्ध्वा=प्राप्त करके; विमृत्युः= मृत्युसे रहित (और); विरजः( सन् )=विशुद्ध—सब प्रकारके विकारोंसे शून्य होकर; : अभूत्=ब्रह्मको प्राप्त हो गया; अन्यः अपि यः=दूसरा भी जो कोई; ( इदम् ) अध्यात्मम् एवं वित्=इस अध्यात्मविद्याको इसी प्रकार जानने- वाला है; ( सः अपि एवम् ) एव (भवति)=वह भी ऐसा ही हो जाता है अर्थात् मृत्यु और विकारोंसे रहित होकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥ व्याख्या-इस प्रकार यमराजके द्वारा उपदिष्ट समस्त विवेचनको श्रद्धापूर्वक सुननेके पश्चात् नचिकेता उनके द्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण विद्या और योगकी विधिको प्राप्त करके जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्त, सब प्रकारके विकारोंसे रहित एव सर्वथा विशुद्ध होकर परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्त हो गया । दूसरा भी जो कोई इस अध्यात्मविद्याको इस प्रकार नचिकेताकी भाँति ठीक-ठीक जाननेवाला और श्रद्धापूर्वक उसे धारण करनेवाला है, वह भी नचिकेताकी भाँति सब विकारोंसे रहित तथा जन्म-मृत्युसे मुक्त होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥ ॥ तृतीय वल्ली ॥३॥ ॥ द्वितीय अध्याय ॥२॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कठोपनिषद् ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ कठोपनिषद्‌के आरम्भमे दिया जा चुका है ।