भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 832 में से

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पृष्ठ 256

२३२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या-जब साधकके हृदयकी अहन्ता-ममतारूप समस्त अज्ञान ग्रन्थियाँ भलीभाँति कट जाती हैं, उसके सब प्रकार- के संशय सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और उपर्युक्त उपदेशके अनुसार उसे यह दृढ निश्चय हो जाता है कि 'परब्रह्म परमेश्वर अवश्य हैं और वे निश्चय ही मिलते हैं,' तब वह इस शरीरमें रहते हुए ही परमात्माका साक्षात् करके अमर हो जाता है। बस, इतना ही वेदान्तका सनातन उपदेश है ॥ १५ ॥ सम्बन्ध-अब मरनेके बाद होनेवाली जीवात्माकी गतिका वर्णन करते हैं- शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्डन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१६॥ हृदयस्य=हृदयकी; शतम् च एका च= (कुल मिलाकर) एक सौ एक, नाड्यः =नाड़ियाँ हैं; तासाम् =उनमेंसे; एका=एक; मूर्धानम् =मूर्धा (कपाल) की ओर, अभिनिःसृता=निकली हुई है (इसे ही सुषुम्णा कहते हैं); तया= उसके द्वारा, ऊर्ध्वम् =ऊपरके लोकोंमें; आयन्=जाकर (मनुष्य), अमृतत्वम् =अमृतभावको; एति=प्राप्त हो जाता है; अन्याः=दूसरी एक सौ नाड़ियाँ; उत्क्रमणे =मरणकालमें (जीवको); विष्वङ्=नाना प्रकारकी योनियोंमे ले जानेकी हेतु; भवन्ति =होती है ॥ १६ ॥ व्याख्या-हृदयमें एक सौ एक प्रधान नाड़ियाँ हैं, जो वहाँसे सब ओर फैली हुई हैं। उनमेंसे एक नाड़ी, जिसको सुषुम्णा कहते हैं, हृदयसे मस्तककी ओर गयी है। भगवान्‌के परमधाममें जानेका अधिकारी उस नाड़ीके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर सबसे ऊँचे लोकमें अर्थात् भगवान्‌के परमधाममे जाकर अमृतस्वरूप परमानन्दमय परमेश्वरको प्राप्त हो जाता है; और दूसरे जीव मरणकालमें दूसरी नाड़ियोंके द्वारा शरीरसे बाहर निकलकर अपने-अपने कर्म और वासनाके अनुसार नाना योनियोंको प्राप्त होते हैं ॥ १६ ॥ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण। तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥१७॥ अन्तरात्मा=सबका अन्तर्यामी, अङ्गुष्ठमात्रः =अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला, पुरुषः=परम पुरुष, सदा =सदैव, जनानाम् = मनुष्योंके, हृदये=हृदयमें, संनिविष्टः =भलीभाँति प्रविष्ट है; तम् =उसको, मुञ्जात् =मूँजसे; इषीकाम् इव =सींककी भाँति, स्वात्=अपनेसे (और), शरीरात् =शरीरसे, धैर्येण=धीरतापूर्वक, प्रवृहेत्=पृथक् करके देखे; तम् =उसीको, शुक्रम् अमृतम् विद्यात्=विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे, तम् शुक्रम् अमृतम् विद्यात् = (और) उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप समझे ॥ १७ ॥ व्याख्या-सबके अन्तर्यामी परमपुरुष परमेश्वर हृदयके अनुरूप अङ्गुष्ठमात्र रूपवाले होकर सदैव सभी मनुष्योंके भीतर निवास करते हैं, तो भी मनुष्य उनकी ओर देखतातक नहीं ! जो प्रमादरहित होकर उनकी प्राप्तिके साधनमे लगे हैं, उन मनुष्योंको चाहिये कि उन शरीरस्थ परमेश्वरको इस शरीरसे और अपने-आपसे भी उसी तरह पृथक् और विलक्षण समझें, जैसे साधारण लोग मूँजसे सींकको पृथक् देखते हैं। अर्थात् जिस प्रकार मूँजमें रहनेवाली सींक मूँजसे विलक्षण और पृथक् है, उसी प्रकार वह शरीर और आत्माके भीतर रहनेवाला परमेश्वर उन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है। वही विशुद्ध अमृत है, वही विशुद्ध अमृत है। यहाँ यह वाक्यकी पुनरावृत्ति उपदेशकी समाप्ति एव सिद्धान्तकी निश्चितताको सूचित करती है* ॥ १७ ॥

  • इसका अन्य आदरणीय महानुभावोंने यह अर्थ किया है— “अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो जीवोंके हृदयमें स्थित उनका अन्तरात्मा है, उसे धैर्य-—अप्रमादपूर्वक मूँजसे सींकके निकालनेके समान शरीरसे बाहर निकालकर पृथक् करे। शरीरमे पृथक् किये हुए उस अङ्गुष्ठमात्र पुरुषको ही चिन्मात्र विशुद्ध और अमृतमय ब्रह्म जाने। यहा 'त विद्याच्छुक्रममृतम्' इस पदकी द्विरुक्ति और 'इति' उपनिषद्‌की समाप्तिके लिये है।”