भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 832 में से

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पृष्ठ 255
  • कठोपनिषद् * २३१ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह इन सबकी पहुँचसे परे है। परंतु वह है अवश्य और उसे प्राप्त करनेकी तीव्र इच्छा रखनेवालेको वह अवश्य मिलता है—इस बातको जो नहीं कहता, नहीं स्वीकार करता अर्थात् इसपर जिसका दृढ विश्वास नहीं है, उसको वह कैसे मिल सकता है ? अतः पूर्व मन्त्रोंमें बतलायी हुई रीतिके अनुसार इन्द्रिय-मन आदि सबको योगाभ्यासके द्वारा रोककर 'वह अवश्य है और साधकको मिलता है' ऐसे दृढतम निश्चयसे निरन्तर उसकी प्राप्तिके लिये परम उत्कण्ठाके साथ प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥ १२ ॥ अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः। अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥१३॥ अस्ति = (अतः उस परमात्माको पहले तो) 'वह अवश्य है'; इति एव = इस प्रकार निश्चयपूर्वक; उपलब्धव्यः = ग्रहण करना चाहिये, अर्थात् पहले उसके अस्तित्वका दृढ निश्चय करना चाहिये; [तदनु=तदनन्तर,] तत्त्वभावेन = तत्त्वभावसे भी; [ उपलब्धव्यः = उसे प्राप्त करना चाहिये, ] उभयोः = इन दोनों प्रकारोंमेंसे, अस्ति इति एव = 'वह अवश्य है' इस प्रकार निश्चयपूर्वक, उपलब्धस्य = परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करनेवाले साधकके लिये, तत्त्वभावः = परमात्माका तात्त्विक स्वरूप ( अपने-आप); प्रसीदति = (शुद्ध हृदयमें) प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥ व्याख्या—साधकको चाहिये कि पहले तो वह इस बातका दृढ निश्चय करे कि 'परमेश्वर अवश्य हैं और वे साधक- को अवश्य मिलते हैं,' फिर इसी विश्वाससे उन्हें स्वीकार करे और उसके पश्चात् तात्त्विक विवेचनपूर्वक निरन्तर उनका ध्यान करके उन्हें प्राप्त करे। जब साधक इस निश्चित विश्वाससे भगवान्‌को स्वीकार कर लेता है कि 'वे अवश्य हैं और अपने हृदयमें ही विराजमान हैं, यत्नशीलको उनकी प्राप्ति अवश्य होती है,' तो परमात्माका वह तात्त्विक दिव्य स्वरूप उसके विशुद्ध हृदयमें अपने-आप प्रकट हो जाता है, उसका प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ १३ ॥ सम्बन्ध—अत्र निष्कामभावकी महिमा बतलाते हैं— यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१४॥ अस्य = इस (साधक') के, हृदि श्रिताः = हृदयमे स्थित, ये कामाः = जो कामनाएँ (हैं); सर्वे यदा = (वे) सब-की- सब जब; प्रमुच्यन्ते = समूल नष्ट हो जाती हैं, अथ = तब, मर्त्यः = मरणधर्मा मनुष्य, अमृतः = अमर, भवति = हो जाता है (और), अत्र = (वह) यहीं, ब्रह्म समश्नुते = ब्रह्मका भलीभाँति अनुभव कर लेता है ॥ १४ ॥ व्याख्या—मनुष्यका हृदय नित्य-निरन्तर विभिन्न प्रकारकी इहलौकिक और पारलौकिक कामनाओसे भरा रहता है; इसी कारण न तो वह कभी यह विचार ही करता है कि परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है और न काम्यविषयोंकी आसक्तिके कारण वह परमात्माको पानेकी अभिलाषा ही करता है। ये सारी कामनाएँ साधक पुरुषके हृदयसे जब समूल नष्ट हो जाती हैं, तब वह—जो सदासे मरणधर्मा था— अमर हो जाता है और यहीं— इस मनुष्य-शरीरमें ही उस परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति साक्षात् अनुभव कर लेता है ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—संशयरहित दृढ निश्चयकी महिमा बतलाते हैं— यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥१५॥ यदा = जब (इसके), हृदयस्य = हृदयकी, सर्वे = सम्पूर्ण; ग्रन्थयः = ग्रन्थियाँ, प्रभिद्यन्ते = भलीभाँति खुल जाती हैं; अथ = तब; मर्त्यः = वह मरणधर्मा मनुष्य, इह = इसी शरीरमें; अमृतः = अमर; भवति = हो जाता है, हि एतावत् = बस, इतना ही; अनुशासनम् = सनातन उपदेश है ॥ १५ ॥
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