भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

२२८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * लिये बाध्य होना पड़ता है । अतएव मनुष्यको मृत्युसे पहले पहले ही परमात्माको जान लेना चाहिये* ॥४॥ यथाऽऽदर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥ यथा आदर्शों=जैसे दर्पणमें (सामने आयी हुई वस्तु दीखती है); तथा आत्मनि=वैसे ही शुद्ध अन्तःकरणमें (ब्रह्मके दर्शन होते हैं), यथा स्वप्ने=जैसे स्वप्नमें (वस्तु अस्पष्ट दिखलायी देती है), तथा पितृलोके=उसी प्रकार पितृलोकमें (परमेश्वर दीखता है); यथा अप्सु=जैसे जलमें (वस्तुके रूपकी झलक पड़ती है); तथा गन्धर्वलोके=उसी प्रकार गन्धर्वलोकमें, परि ददृशे इव=परमात्माकी झलक सी पड़ती है (और); ब्रह्मलोके=ब्रह्मलोकमें (तो), छायातपयोः इव=छाया और धूपकी भाँति (आत्मा और परमात्मा दोनोंका स्वरूप पृथक् पृथक् स्पष्ट दिखलायी देता है) ॥ ५ ॥ व्याख्या—जैसे मलरहित दर्पणमें उसके सामने आयी हुई वस्तु दर्पणसे विलक्षण और स्पष्ट दिखलायी देती है, उसी प्रकार ज्ञानी महापुरुषोंके विशुद्ध अन्तःकरणमें वे परमेश्वर उससे विलक्षण एव स्पष्ट दिखलायी देते हैं। जैसे स्वप्नमें वस्तुसमूह यथार्थरूपमे न दीखकर स्वप्नद्रष्टा मनुष्यकी वासना और विविध संस्कारोंके अनुसार कहींकी वस्तु कहीं विशृङ्खलरूपसे अस्पष्ट दिखायी देती है, वैसे ही पितृलोकमें परमेश्वरका स्वरूप यथावत् स्पष्ट न दीखकर अस्पष्ट ही दीखता है; क्योंकि पितृलोकको प्राप्त प्राणी पूर्व-जन्मकी स्मृति और वहाँके सम्बन्धियोंका पूर्ववत् ज्ञान होनेके कारण तदनुरूप वासनाजालमें आबद्ध रहते हैं। गन्धर्वलोक पितृलोककी अपेक्षा कुछ श्रेष्ठ है, इसलिये जैसे स्वप्नकी अपेक्षा जाग्रत् अवस्थामें जलके अदर देखनेपर प्रतिबिम्ब कुछ-का-कुछ न दीखकर यथावत् तो दीखता है, परंतु जलकी लहरोंके कारण हिलता हुआ-सा प्रतीत होता है, स्पष्ट नहीं दीखता, वैसे ही गन्धर्वलोकमें भी-भोग-लहरियोंमें लहराते हुए चित्तसे युक्त वहाँके निवासियोंको भगवान्‌के सर्वथा स्पष्ट दर्शन नहीं होते । किंतु ब्रह्मलोकमे वहाँ रहनेवालोंको छाया और धूपकी तरह अपना और उन परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञान प्रत्यक्ष और सुस्पष्ट होता है । वहाँ किसी प्रकारका भ्रम नहीं रहता । तीसरी वल्लीके पहले मन्त्रमें बतलाया गया है कि यह मनुष्यशरीर भी एक लोक है, इसमें परब्रह्म परमेश्वर और जीवात्मा—दोनों छाया और धूपकी तरह हृदयरूप गुफामें रहते हैं। अतः मनुष्यको दूसरे लोकोंकी कामना न करके इस मनुष्यशरीरके रहते-रहते ही उस परब्रह्म परमेश्वरको जान लेना चाहिये। यही इसका अभिप्राय है† ॥ ५ ॥

  • एक महानुभावने इस मन्त्रमें 'सर्गेषु'के स्थानपर 'स्वर्गेषु' पाठ मानकर इस प्रकार अर्थ किया है— यदि इस शरीरका पतन होनेसे पहले ही कोई भगवान्‌को जान लेता है तो वह फिर स्वर्ग नामसे ख्यात वैकुण्ठादि दिव्य लोकों- में अप्राकृत चिदानन्दात्मक शरीर प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। † इस मन्त्रका भावार्थ निम्नलिखित रूपोंमें भी किया गया है— १—जैसे दर्पणमें मुखमण्डल स्पष्ट दीखता है, वैसे ही महापुरुषोंको ज्ञाननेत्रोंके द्वारा अपने अंदर भगवान्‌के स्पष्ट दर्शन होते हैं । लोकोंमें प्राय इम प्रकारका स्पष्ट ज्ञान नहीं होता । पितृलोकमें वैसे ही अस्पष्ट ज्ञान होता है, जैसा स्वप्नमें होता है, गन्धर्वलोकका स्तर ज्ञानमें पितृलोककी अपेक्षा कहीं ऊँचा है, इसलिये वहाँ पितृलोककी अपेक्षा कुछ अधिक स्पष्ट ज्ञान होता है—वैसे ही जैसे लहराते हुए जलमें अस्पष्ट मुख दीखता है । ब्रह्मलोकमें अधिक स्पष्ट ज्ञान होता है—वैसे ही जैसे छाया-धूपके बीचमें प्रभातके समय, जब न तो दुपहरीका प्रकाश रहता है और न रात्रिका अन्धकार होता है एव वस्तु स्पष्ट दीखती है। २—जैसा काँच होता है, उसके सामने आयी हुई वस्तु उसीके अनुसार छोटी-बड़ी, दूर-समीप या लाल-पीली दिखलायी देती है । वैसे ही इस लोकमें मनुष्यका जैसा—मलिन, मिश्रित अथवा स्वच्छ अन्त करण होता है, वैसा ही उसके द्वारा भगवान्‌का रूप समझमें आता है । पितृलोक अपेक्षाकृत शुद्ध है, इसलिये वहाँ, जैसे स्वप्नमें वस्तु विशृङ्खल दीखनेपर भी कुछ स्पष्ट दीखती है, वैसे ही पितृलोकमें परमेश्वरके रूपका ज्ञान होता है । गन्धर्वलोकमें, निर्मल जलमें दीखनेवाले रूपकी भाँति और भी स्पष्ट दिखायी देता है एवं ब्रह्मलोकमें तो छाया तथा धूपकी भाँति बहुत स्पष्ट रूपमें ऐसा ज्ञान होता है कि पूर्णप्रकाश परमेश्वरके साथ ही उसीके आधारपर अल्पप्रकाश जीवात्मा भी स्थित है अर्थात् एक ही परमात्मा दो रूपोंमें प्रकट हैं।