कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 251, कुल 832 में से
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- कठोपनिषद् * २२७ सनातन है । इसका जो मूल कारण है, जिससे यह उत्पन्न होता है, जिससे सुरक्षित है और जिसमें विलीन होता है, वही विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही ब्रह्म है, उसीको अमृत कहते हैं, तथा सब लोक उसीके आश्रित हैं। कोई भी उसका अतिक्रमण करनेमें समर्थ नहीं है। नचिकेता ! यही है वह तत्त्व, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥ यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ निःसृतम्=(परब्रह्म परमेश्वरसे) निकला हुआ, इदम् यत् किं च=यह जो कुछ भी, सर्वम् जगत्=सम्पूर्ण जगत् है; प्राणे एजति=उस प्राणस्वरूप परमेश्वरमें ही चेष्टा करता है, एतत्=इस; उद्यतम् वज्रम्=उठे हुए वज्रके समान; महत् भयम्=महान् भयरूप (सर्वशक्तिमान्) परमेश्वरको, ये विदुः=जो जानते हैं, ते=वे; अमृताः भवन्ति=अमर हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ २ ॥ व्याख्या—यह जो कुछ भी इन्द्रिय, मन और बुद्धिके द्वारा देखने, सुनने और समझनेमे आनेवाला सम्पूर्ण चराचर जगत् है, सब अपने परम कारणरूप जिन परब्रह्म पुरुषोत्तमसे प्रकट हुआ है, उन्हीं प्राणस्वरूप परमेश्वरमें चेष्टा करता है। अर्थात् इसकी चेष्टाओके आधार एव नियामक भी वे परमेश्वर ही हैं। वे परमेश्वर परम दयालु होते हुए भी महान् भयरूप हैं—छोटे-बड़े सभी उनसे भय मानते हैं। साथ ही वे उठे हुए वज्रके समान हैं। जिस प्रकार हाथमें वज्र लिये हुए प्रभुको देखकर सभी सेवक यथाविधि निरन्तर आज्ञापालनमें तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार समस्त देवता सदा-सर्वदा नियमानुसार इन परमेश्वरके आज्ञापालनमें नियुक्त रहते हैं। इस परब्रह्मको जो जानते हैं, वे तत्त्वज्ञ पुरुष अमर हो जाते हैं—जन्म-मृत्युके चक्रसे छूट जाते हैं ॥ २ ॥ भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ अस्य भयात्=इसीके भयसे; अग्निः तपति=अग्नि तपता है, भयात्=(इसीके) भयसे; सूर्यः तपति=सूर्य तपता है; च=तथा; (अस्य) भयात्=इसीके भयसे, इन्द्रः वायुः=इन्द्र, वायु, च=और; पञ्चमः मृत्युः=पाँचवें मृत्यु देवता; धावति=(अपने-अपने काममें) प्रवृत्त हो रहे हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—सबपर शासन करनेवाले और सबको नियन्त्रणमें रखकर नियमानुसार चलानेवाले इन परमेश्वरके भयसे ही अग्नि तपता है, इन्हींके भयसे सूर्य तप रहा है, इन्हींके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवें मृत्यु देवता दौड़-दौड़कर जल आदि बरसाना, चलना, जीवोंके शरीरोंका अन्त करना आदि अपना-अपना काम त्वरापूर्वक कर रहे हैं। सारांश यह कि इस जगत्में देवसमुदायके द्वारा सारे कार्य जो नियमित रूपसे सम्पन्न हो रहे हैं, वे इन सर्वशक्तिमान्, सर्वेश्वर, सबके शासक एव नियन्ता परमेश्वरके अमोघ शासनसे ही हो रहे हैं ॥ ३ ॥ इह चेदशकद् बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ चेत्=यदि; शरीरस्य=शरीरका, विस्रसः=पतन होनेसे, प्राक्=पहले-पहले; इह=इस मनुष्यशरीरमें ही (साधक), बोद्धुम्=परमात्माका साक्षात्; अशकत्=कर सका (तब तो ठीक है); ततः=नहीं तो फिर; सर्गेषु=अनेक कल्पोतक; लोकेषु=नाना लोक और योनियोंमें; शरीरत्वाय कल्पते=शरीर धारण करनेको विवश होता है ॥ ४ ॥ व्याख्या—इस सर्वशक्तिमान्, सबके प्रेरक और सबपर शासन करनेवाले परमेश्वरको यदि कोई साधक इस दुर्लभ मनुष्यशरीरका नाश होनेसे पहले ही जान लेता है, अर्थात् जबतक इसमें भजन स्मरण आदि साधन करनेकी शक्ति बनी हुई है और जबतक यह मृत्युके मुखमे नहीं चला जाता, तभीतक (इसके रहते-रहते ही) सावधानीके साथ प्रयत्न करके परमात्माके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब तो उसका जीवन सफल हो जाता है; अनादिकालसे जन्म-मृत्युके प्रवाहमें पड़ा हुआ वह जीव उससे छुटकारा पा जाता है। नहीं तो, फिर उसे अनेक कल्पोंतक विभिन्न लोकों और योनियोंमें शरीर धारण करनेके