कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तत्=वह, अनिर्देश्यम्=अनिर्वचनीय, परमम्=परम, सुखम्=सुख, एतत्=यह (परमात्मा ही है), इति=यों; मन्यन्ते=(ज्ञानीजन) मानते हैं, तत्=उसको, कथम् नु=किस प्रकारसे; विजानीयाम्=मैं भलीभाँति समझूँ, किमु= क्या वह, भाति=प्रकाशित होता है, वा=या, विभाति=अनुभवमें आता है ॥ १४ ॥ व्याख्या—उस सनातन परम आनन्द और परम शान्तिको प्राप्त ज्ञानी महात्माजन ऐसा मानते हैं कि परब्रह्म पुरुषोत्तम ही वह अलौकिक सर्वोपरि आनन्द है, जिसका निर्देश मन-वाणीसे नहीं किया जा सकता । उस परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको मैं अपरोक्षरूपसे किस प्रकार जानूँ ? क्या वह प्रत्यक्ष प्रकट होता है ? या अनुभवमें आता है ? उसका ज्ञान किस प्रकारसे होता है ? ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—नचिकेताके आन्तरिक भावको समझकर यमराजने कहा— न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१५॥ तत्र=वहाँ, न सूर्यः भाति=न (तो) सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रतारकम्=न चन्द्रमा और तारोंका समुदाय (ही प्रकाशित होता है), न इमाः विद्युततः भान्ति=(और) न ये बिजलियाँ ही (वहाँ) प्रकाशित होती हैं, अयम् अग्निः कुतः=फिर यह (लौकिक) अग्नि कैसे (प्रकाशित हो सकता है क्योंकि); तम्=उसके, भान्तम् एव=प्रकाशित होनेपर ही (उसीके प्रकाशसे), सर्वम्=ऊपर बतलाये हुए सूर्यादि सब, अनुभाति=प्रकाशित होते हैं; तस्य भासा=उसीके प्रकाशसे; इदम् सर्वम्=यह सम्पूर्ण जगत्, विभाति=प्रकाशित होता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—उस स्वप्रकाश परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य नहीं प्रकाशित होता । जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकट होनेपर खद्योतका प्रकाश लुप्त हो जाता है, वैसे ही सूर्यका आंशिक तेज भी उस असीम तेजके सामने लुप्त हो जाता है । चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ नहीं चमकते, फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है । क्योंकि प्राकृत जगत्में जो कुछ भी तत्त्व प्रकाशशील हैं, सब उस परब्रह्म परमेश्वरकी प्रकाश शक्तिके अंशको पाकर ही प्रकाशित हैं । वे अपने प्रकाशकके समीप अपना प्रकाश कैसे फैला सकते हैं। सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत् उस जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे अथवा उस प्रकाशके एक क्षुद्रतम अंगसे प्रकाशित हो रहा है ॥ १५ ॥ ॥ द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥ (५) तृतीय वल्ली ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ १ ॥ ऊर्ध्वमूलः=ऊपरकी ओर मूलवाला, अवाक्शाखः=नीचेकी ओर शाखावाला, एषः=यह (प्रत्यक्ष जगत्), सनातनः अश्वत्थः=सनातन पीपलका वृक्ष है । [ तन्मूलम्=इसका मूलभूत ] तद् एव शुक्रम्=वह (परमेश्वर) ही विशुद्ध तत्त्व है, तत् ब्रह्म=वही ब्रह्म है (और), तद् एव=वही, अमृतम् उच्यते=अमृत कहलाता है, सर्वे लोकाः=सब लोक, तस्मिन्=उसीके, श्रिताः=आश्रित हैं, कश्चन उ=कोई भी, तत्=उसको, न अत्येति=लाँघ नहीं सकता, एतत् वै=यही है, तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १ ॥ व्याख्या—जिसका मूलभूत परब्रह्म पुरुषोत्तम ऊपर है अर्थात् सर्वश्रेष्ठ, सबसे सूक्ष्म और सर्वशक्तिमान् है और जिसकी प्रधान शाखा ब्रह्मा तथा अवान्तर शाखाएँ देव, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि क्रमसे नीचे हैं, ऐसा यह ब्रह्माण्डरूप पीपल वृक्ष अनादिकालीन—सदासे है। कभी प्रकटरूपमे और कभी अप्रकटरूपसे अपने कारणरूप परब्रह्ममे नित्य स्थित रहता है, अतः