कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 249, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 249
- कठोपनिषद् * २२५ जानेवाले नाना प्रकारके बाह्य कर्मरूप दोषोंसे तनिक भी लिप्त नहीं होता । इसी प्रकार सबके अन्तर्यामी भगवान् परब्रह्म पुरुषोत्तम एक हैं, उन्हींकी शक्तिसे शक्तियुक्त होकर मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा मनुष्य नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करते हैं तथा उनका फलरूप सुख-दुःखादि भोगते हैं। परंतु वे परमेश्वर उनके कर्म और दुःखोंसे लिप्त नहीं होते, क्योंकि वे सबमें रहते हुए भी सबसे पृथक् और सर्वथा असङ्ग हैं ॥ ११ ॥ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१२॥ यः=जो; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तर्यामी, एकः वशी=अद्वितीय एव सबको वशमें रखनेवाला (परमात्मा), एकम् रूपम् = (अपने) एक ही रूपको; बहुधा = बहुत प्रकारसे, करोति = बना लेता है; तम् आत्मस्थम् = उस अपने अंदर रहनेवाले (परमात्मा) को, ये धीराः = जो ज्ञानी पुरुष; अनुपश्यन्ति = निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम् = उन्हींको, शाश्वतम् सुखम् = सदा अटल रहनेवाला परमानन्दस्वरूप वास्तविक सुख (मिलता है), इतरेषाम् न = दूसरोंको नहीं ॥१२॥ व्याख्या-जो परमात्मा सदा सबके अन्तरात्मारूपसे स्थित हैं, जो अद्वितीय हैं और सम्पूर्ण जगत्मे देव-मनुष्यादि सभीको सदा अपने वशमें रखते हैं, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वभवनसमर्थ परमेश्वर अपने एक ही रूपको अपनी लीलासे बहुत प्रकारका बना लेते हैं। उन परमात्माको जो ज्ञानी महापुरुष निरन्तर अपने अदर स्थित देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाला-सनातन परमानन्द मिलता है, दूसरोंको नहीं ॥ १२ ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१३॥ यः = जो, नित्यानाम्* = नित्योंका (भी); नित्यः = नित्य (है); चेतनानाम् = चेतनोंका (भी), चेतनः = चेतन है (और); एकः बहूनाम् = एक होते हुए भी इन अनेक (जीवों) की; कामान् = कामनाओंको, विदधाति = पूर्ण करता है, तम् आत्मस्थम् = उस अपने अंदर रहनेवाले (पुरुषोत्तमको), ये धीराः = जो ज्ञानी; अनुपश्यन्ति = निरन्तर देखते रहते हैं, तेषाम् = उन्हींको; शाश्वती शान्तिः = सदा अटल रहनेवाली शान्ति (प्राप्त होती है); इतरेषाम् न = दूसरोंको नहीं ॥ १३ ॥ व्याख्या-जो समस्त नित्य चेतन आत्माओंके भी नित्य चेतन आत्मा हैं और जो स्वयं एक होते हुए ही अनन्त जीवोके भोगोंका उन-उनके कर्मानुसार निर्माण करते हैं, उन सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमको जो ज्ञानी महापुरुष अपने अदर निरन्तर स्थित देखते हैं, उन्हींको सदा स्थिर रहनेवाली-सनातनी परम शान्ति मिलती है, दूसरोको नहीं † ॥ १३ ॥ सम्बन्ध-जिज्ञासु नचिकेता इस प्रकार उस ब्रह्मप्राप्तिके आनन्द और शान्तिकी महिमा सुनकर मन-ही-मन विचार करने लगा- तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥१४॥
- कुछ लोगोंने 'नित्य अनित्यानाम्' पाठ मानकर उसका अर्थ यह किया है कि यह आत्मा जितने भी विनाशशील भाव- पदार्थ हैं, उनमें अविनाशी है। अर्थात् यह 'शक्तियेोपलब्धका आधार' है। जब समस्त पदार्थोंका लय हो जाता है, तब उस लयको भी अपने अदर विलीन करनेवाला, लयका भी साक्षी आत्मा रह जाता है। इसलिये वह अनित्योंमें नित्य है। † कुछ महानुभावोंने इस मन्त्रका ऐसा अर्थ किया है- जो आकाश, काल आदि नित्यके नामसे प्रसिद्ध पदार्थोंको नित्यत्व प्रदान करनेवाला परम नित्य है और जो ब्रह्मादि चेतनोंको भी चेतनत्व प्रदान करनेवाला चेतन है, जो अकेला ही अनेकोंकी कामनाएँ पूर्ण करता है, अपनी बुद्धिमें स्थित उस आत्माको जो विवेकशील पुरुष देखते हैं, उन्हींको नित्य शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं। उ० अं० २९-