भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

२२४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—अब अग्निके दृष्टान्तसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी व्यापकता और निर्लेपताका वर्णन करते हैं— अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९॥ यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमे; प्रविष्टः=प्रविष्ट; एकः अग्निः=एक ही अग्नि; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उनके समान रूपवाला ही; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही); सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एकः (सन्) =एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमे; प्रतिरूपः=उन्हींके-जैसे रूपवाला (हो रहा है); च बहिः=और उनके बाहर भी है ॥ ९॥ व्याख्या—एक ही अग्नि निराकाररूपसे सारे ब्रह्माण्डमे व्याप्त है, उसमे कोई भेद नहीं है; परंतु जब वह साकाररूपसे प्रज्वलित होता है, तब उन आधारभूत वस्तुओंका जैसा आकार होता है, वैसा ही आकार अग्निका भी दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमेश्वर एक हैं और सबमें समभावसे व्याप्त हैं, उनमे किसी प्रकारका कोई भेद नहीं है, तथापि वे भिन्न भिन्न प्राणियोंमे उन-उन प्राणियोंके अनुरूप नाना रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। भाव यह कि आधारभूत वस्तुके अनुरूप ही उनकी महिमाका प्राकट्य होता है। वास्तवमें उन परमेश्वरकी महत्ता इतनी ही नहीं है, इससे बहुत अधिक और विलक्षण है। उनकी अनन्त शक्तिके एक क्षुद्रतम अशसे ही यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नाना प्रकारकी आश्चर्य- मय शक्तियोंसे सम्पन्न हो रहा है ॥ ९॥ सम्बन्ध—वही बात वायुके दृष्टान्तसे कहते हैं— वायैर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१०॥ यथा=जिस प्रकार; भुवनम्=समस्त ब्रह्माण्डमें; प्रविष्टः=प्रविष्ट; एकः वायुः=एक (ही) वायु; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमें; प्रतिरूपः=उनके समान रूपवाला ही; बभूव=हो रहा है; तथा=वैसे (ही,) सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा परब्रह्म; एकः (सन् अपि)=एक होते हुए भी; रूपम् रूपम्=नाना रूपोंमे; प्रतिरूपः=उन्हींके-जैसे रूपवाला (हो रहा है); बहिः च=और उनके बाहर भी है ॥ १०॥ व्याख्या—एक ही वायु अव्यक्तरूपसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमे व्याप्त है, तथापि व्यक्तमे भिन्न-भिन्न वस्तुओंके संयोगसे उन-उन वस्तुओके अनुरूप गति और शक्तिवाला दिखलायी देता है। उसी प्रकार समस्त प्राणियोका अन्तर्यामी परमेश्वर एक होते हुए भी उन-उन प्राणियोंके सम्बन्धसे पृथक् पृथक् शक्ति और गतिवाला दीखता है, किंतु वह उतना ही नहीं है, उन सबके बाहर भी अनन्त—असीम एव विलक्षण रूपसे स्थित है। (नवम मन्त्रकी व्याख्याके अनुसार इसे भी समझ लेना चाहिये)॥ १०॥ सम्बन्ध—इस मन्त्रमें सूर्यके दृष्टान्तसे परमात्माकी निर्लेपता दिखलाते हैं— सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥११॥ यथा=जिस प्रकार; सर्वलोकस्य=समस्त ब्रह्माण्डका; चक्षुः सूर्यः=प्रकाशक सूर्य देवता; चाक्षुषैः=लोगोंकी आँखों- से होनेवाले; बाह्यदोषैः=बाहरके दोषोंसे; न लिप्यते=लिप्त नहीं होता; तथा=उसी प्रकार; सर्वभूतान्तरात्मा=सब प्राणियोंका अन्तरात्मा परमात्मा; एकः=एक है, (तो भी) लोकदुःखेन=लोगोंके दुःखोंसे; न लिप्यते=लिप्त नहीं होता; [यतः=क्योंकि;] बाह्यः=सबमे रहता हुआ भी वह सबसे अलग है ॥ ११॥ व्याख्या—एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है। उसका प्रकाश प्राणिमात्रकी आँखोंका सहायक है। उस प्रकाशकी ही सहायता लेकर लोग नाना प्रकारके गुणदोषमय कर्म करते हैं, परंतु सूर्य उनके नेत्रोंद्वारा किये