कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- कठोपनिषद् * २२३ सनातनः ब्रह्म=ब्रह्म (जैसा है), च=और; आत्मा=जीवात्मा, मरणम् प्राप्य=मरकर, यथा=जिस प्रकारसे; भवति=रहता है; इदम् ते=यह बात तुम्हें; हन्त प्रवक्ष्यामि=मैं अब फिरसे बतलाऊँगा ॥ ५-६ ॥ व्याख्या—यमराज कहते हैं—नचिकेता ! एक दिन निश्चय ही मृत्युके मुखमें जानेवाले ये मनुष्यादि प्राणी न तो प्राणकी शक्तिसे जीवित रहते हैं और न अपानकी शक्तिसे ही। इन्हें जीवित रखनेवाला तो कोई दूसरा ही चेतन तत्त्व है और वह है जीवात्मा । ये प्राण-अपान दोनों उस जीवात्माके ही आश्रित हैं। जीवात्माके बिना एक क्षण भी ये नहीं रह सकते; जब जीवात्मा जाता है, तब केवल ये ही नहीं, इन्द्रींके साथ इन्द्रियादि सभी उसका अनुसरण करते हुए चले जाते हैं। अब मैं तुमको यह बतलाऊँगा कि मनुष्यके मरनेके बाद इस जीवात्माका क्या होता है, यह कहाँ जाता है, तथा किस प्रकार रहता है और साथ ही यह भी बतलाऊँगा कि उस परम रहस्यमय सर्वव्यापी सर्वाधार सर्वाधिपति परब्रह्म परमेश्वरका क्या स्वरूप है ॥ ५-६ ॥ योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७॥ यथाकर्म = जिसका जैसा कर्म होता है, यथाश्रुतम् = और शास्त्रादिके श्रवणद्वारा जिसको जैसा भाव प्राप्त हुआ है (उन्हींके अनुसार ), शरीरत्वाय=शरीर धारण करनेके लिये, अन्ये = कितने ही, देहिनः=जीवात्मा तो, योनिम्=( नाना प्रकारकी जङ्गम) योनियोंको, प्रपद्यन्ते = प्राप्त हो जाते हैं और; अन्ये=दूसरे (कितने ही), स्थाणुम् = स्थाणु (स्थावर) भावका; अनुसंयन्ति = अनुसरण करते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या—यमराज कहते हैं कि अपने-अपने शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार और शास्त्र, गुरु, सङ्ग, शिक्षा, व्यवसाय आदिके द्वारा देखे-सुने हुए भावोंसे निर्मित अन्त कालीन वासनाके अनुसार मरनेके पश्चात् कितने ही जीवात्मा तो दूसरा शरीर धारण करनेके लिये शुक्रके साथ माताकी योनिमें प्रवेश कर जाते हैं। इनमें जिनके पुण्य-पाप समान होते हैं, वे मनुष्यका, और जिनके पुण्य कम तथा पाप अधिक होते हैं, वे पशु पक्षीका शरीर धारण करके उत्पन्न होते हैं और कितने ही, जिनके पाप अत्यधिक होते हैं, वे स्थावरभावको प्राप्त होते हैं अर्थात् वृक्ष, लता, तृण, पर्वत आदि जड शरीरोंमें उत्पन्न होते हैं ॥७॥ सम्बन्ध—यमराजने जीवात्माकी गति और परमात्माका स्वरूप—इन दो बातोंको बतलानेकी प्रतिज्ञा की थी, इनमें 'मरनेके बाद जीवात्माकी क्या गति होती है, इसको बतलाकर अब वे दूसरी बात बतलाते हैं— य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ८॥ यः एषः=जो यह; कामम् कामम् = (जीवोंके कर्मानुसार) नाना प्रकारके भोगोंका, निर्मिमाणः = निर्माण करनेवाला; पुरुषः = परमपुरुष परमेश्वर; सुप्तेषु = (प्रलयकालमें सबके ) सो जानेपर भी, ^=जागता रहता है, तत् एव = वही; शुक्रम् = परम विशुद्ध तत्त्व है; तत् ब्रह्म = वही ब्रह्म है, तत् एव = वही; अमृतम्=अमृत; उच्यते = कहलाता है; (तथा) तस्मिन् =उसीमें, सर्वे = सम्पूर्ण, लोकाः श्रिताः = लोक आश्रय पाये हुए हैं, तत् कश्चन उ = उसे कोई भी; न अत्येति = अतिक्रमण नहीं कर सकता; एतत् वै =यही है; तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था ) ॥ ८ ॥ व्याख्या—जीवात्माओंके कर्मानुसार उनके लिये नाना प्रकारके भोगोंका निर्माण करनेवाला तथा उनकी यथायोग्य व्यवस्था करनेवाला जो यह परमपुरुष परमेश्वर समस्त जीवोंके सो जानेपर अर्थात् प्रलयकालमें सबका ज्ञान लुप्त हो जानेपर भी अपनी महिमामें नित्य जागता रहता है, जो स्वयं ज्ञानस्वरूप है, जिसका ज्ञान सदैव एकरस रहता है, कभी अधिक-न्यून या लुप्त नहीं होता, वही परम विशुद्ध दिव्य तत्त्व है, वही परब्रह्म है, उसीको ज्ञानी महापुरुषोंके द्वारा प्राप्य परम अमृतरूप परमानन्द कहा जाता है । ये सम्पूर्ण लोक उसीके आश्रित हैं। उसे कोई भी नहीं लाँघ सकता—कोई भी उसके नियमोंका अतिक्रमण नहीं कर सकता । सभी सदा-सर्वदा एकमात्र उसीके शासनमें रहनेवाले और उसीके अधीन हैं । कोई भी उसकी महिमाका पार नहीं पा सकता । यही है वह ब्रह्म-तत्त्व, जिसके विषयमें तुमने पूछा था ॥ ८ ॥