कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 246, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२२२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ प्राणम् = (जो) प्राणको, ऊर्ध्वम् = ऊपरकी ओर, उन्नयति = उठाता है (और); अपानम् = अपानको, प्रत्यक् अस्यति = नीचे ढकेलता है, मध्ये = शरीरके मध्य (हृदय) में, आसीनम् = बैठे हुए (उस), वामनम् = सर्वश्रेष्ठ भजनेयोग्य परमात्माकी, विश्वे देवाः = सभी देवता, उपासते = उपासना करते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—शरीरमें नियमितरूपसे अनवरत प्राण-अपानादिकी क्रिया हो रही है; इन जड पदार्थोंमें जो क्रियाशीलता आ रही है, वह उन परमात्माकी शक्ति और प्रेरणासे ही आ रही है। वे ही मानव हृदयमें राजाकी भाँति विराजित रहकर प्राणको ऊपरकी ओर चढा रहे हैं और अपानको नीचेकी ओर ढकेल रहे हैं। इस प्रकार शरीरके अदर होनेवाले सारे व्यापारोंका सुचारूरूपसे सम्पादन कर रहे हैं। उन हृदयस्थित परम भजनीय परब्रह्म पुरुषोत्तमकी सभी देवता उपासना कर रहे हैं—शरीरस्थित प्राण मन बुद्धि-इन्द्रियादिके सभी अधिष्ठातृ-देवता उन परमेश्वरकी प्रसन्नताके लिये उन्हींकी प्रेरणाके अनुसार नित्य सावधानीके साथ समस्त कार्योंका यथाविधि सम्पादन करते रहते हैं ॥ ३ ॥ अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ अस्य = इस, शरीरस्थस्य = शरीरमें स्थित, विस्रंसमानस्य = एक शरीरसे दूसरे शरीरमे जानेवाले, देहिनः = जीवात्माके; देहात् = शरीरसे, विमुच्यमानस्य = निकल जानेपर, अत्र = यहाँ (इस शरीरसे), किम् परिशिष्यते = क्या शेष रहता है, एतत् वै = यही है, तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमे तुमने पूछा था) ॥ ४ ॥ व्याख्या—यह एक शरीरसे दूसरे शरीरमें गमन करनेके स्वभाववाला देही (जीवात्मा) जब इस वर्तमान शरीरसे निकलकर चला जाता है और उसके साथ ही जब इन्द्रिय, प्राण आदि भी चले जाते हैं, तब इस मृत शरीरमें क्या वच रहता है ? देखनेमें तो कुछ भी नहीं रहता, पर वह परब्रह्म परमेश्वर, जो सदा-सर्वदा समानभावसे सर्वत्र परिपूर्ण है, जो चेतन जीव तथा जड प्रकृति—सभीमें सदा व्याप्त है, वह रह जाता है। यही वह ब्रह्म है, जिसके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—अब निम्नाङ्कित दो मन्त्रोंमें यमराज नचिकेताके पूछे हुए तत्त्वका पुन दूसरे प्रकारसे वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं— न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ हन्त तं इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ कश्चन = कोई भी, मर्त्यः = मरणधर्मा प्राणी, न प्राणेन = न तो प्राणसे (जीता है और), न अपानेन = न अपानसे (ही), जीवति = जीता है, तु = किंतु, यस्मिन् = जिसमें, एतौ उपाश्रितौ = (प्राण और अपान) ये दोनों आश्रय पाये हुए हैं, इतरेण = (ऐसे किसी) दूसरेसे ही, जीवन्ति = (सब) जीते हैं, गौतम = हे गौतमवंशीय, गुह्यम् सनातनम् = (वह) रहस्यमय मत्स्यादिमें हैं, पृथ्वीसे उत्पन्न वृक्ष-अन्नादिमें हैं, पर्वतोंसे उत्पन्न नदा आदिमें है, जो मुक्त पुरुषोंमें है (मुक्तोंको 'ऋता' कहते हैं, उनमें रहकर जो उनका नियन्त्रण करता है, वह ऋतजा है), और परम सत्य है तथा सब गुणोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। २—जो गमन करनेवाला है, आकाशमें चलनेवाला सूर्य है, आकाशमें व्याप्त वायु है, पृथ्वीमें रहनेवाला होता—अग्नि है, कलशमें स्थित सोम है, घरोंमें रहनेवाला ब्राह्मण अतिथि है, मनुष्योंमें गमन करनेवाला, देवताओंमें जानेवाला, यज्ञ या सत्यमें निवास करनेवाला, आकाशमें चलनेवाला, जलमें शङ्ख-सीपी आदि रूपोंमें उत्पन्न होनेवाला, पृथ्वीमें अन्नादिरूपसे उत्पन्न होनेवाला, यज्ञान्नरूपसे उत्पन्न होनेवाला, पर्वतोंसे नदी आदिके रूपमें उत्पन्न होनेवाला, सत्यस्वरूप और महान् है अर्थात् जगत्का एकमात्र सर्वव्यापक आत्मा है।