कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; पुरुषः=परमपुरूष परमात्मा; अधूमकः=धूमरहित, ज्योतिः इव=ज्योतिकी भाँति है; भूतभव्यस्य=भूत, (वर्तमान और) भविष्यपर; ईशानः=शासन करनेवाला; सः एव अद्य=वह परमात्मा ही आज है; उ=और; सः (एव) श्वः=वही कल भी है (अर्थात् वह नित्य, सनातन है), एतत् वै=यही है; तत्=वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १३ ॥ व्याख्या—मनुष्यकी हृदय-गुफामें स्थित ये अङ्गुष्ठमात्र पुरुष भूत, भविष्य और वर्तमानका नियन्त्रण करनेवाले स्वतन्त्र शासक हैं। ये ज्योतिर्मय हैं। सूर्य, अग्निकी भाँति उष्ण प्रकाशवाले नहीं; परंतु दिव्य, निर्मल और शान्त प्रकाशस्वरूप हैं। लौकिक ज्योतियोंमें धूमरूप दोष होता है; ये धूमरहित—दोषरहित, सर्वथा विशुद्ध हैं। अन्य ज्योतियाँ घटती-बढ़ती हैं और समयपर बुझ जाती हैं, परंतु ये जैसे आज हैं, वैसे ही कल भी हैं। इनकी एकरसता नित्य अक्षुण्ण है। ये कभी न तो घटते-बढ़ते हैं और न कभी मिटते ही हैं। नचिकेता! ये परिवर्तनरहित अविनाशी परमेश्वर ही वे ब्रह्म हैं, जिनके सम्बन्धमे तुमने पूछा था* ॥ १३ ॥ यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान् पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥१४॥ यथा=जिस प्रकार, दुर्गे=ऊँचे शिखरपर, वृष्टम्=बरसा हुआ; उदकम्=जल; पर्वतेषु=पहाड़के नाना स्थलोंमें; विधावति=चारों ओर चला जाता है; एवम्=उसी प्रकार; धर्मान्=भिन्न-भिन्न धर्मों (स्वभावों) से युक्त देव, असुर, मनुष्य आदिको, पृथक्=परमात्मासे पृथक्, पश्यन्=देखकर (उनका सेवन करनेवाला मनुष्य); तान् एव=उन्हींके; अनु- विधावति=पीछे दौड़ता रहता है (उन्हींके शुभाशुभ लोकोंमे और नाना उच्च-नीच योनियोंमें भटकता रहता है) ॥ १४॥ व्याख्या—वर्षाका जल एक ही है; पर वह जब ऊँचे पर्वतकी ऊबड़-खाबड़ चोटीपर बरसता है तो वहाँ ठहरता नहीं, तुरत ही नीचेकी ओर बहकर विभिन्न वर्ण, आकार और गन्धको धारण करके पर्वतमें चारों ओर बिखर जाता है। इसी प्रकार एक ही परमात्मासे प्रवृत्त विभिन्न स्वभाववाले देव असुर मनुष्यादिको जो परमात्मासे पृथक् मानता है और पृथक् मानकर ही उनका सेवन करता है, उसे भी बिखरे हुए जलकी भाँति ही विभिन्न देव-असुरादिके लोकोंमें एव नाना प्रकारकी योनियों- में भटकना पड़ता है, वह ब्रह्मको प्राप्त नहीं हो सकता ॥ १४॥ यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥१५॥ यथा=(परंतु) जिस प्रकार; शुद्धे (उदके)=निर्मल जलमें; आसिक्तम्=(मेघोंद्वारा) सब ओरसे बरसाया हुआ; शुद्धम्=निर्मल, उदकम्=जल; तादृक् एव=वैसा ही, भवति=हो जाता है; एवम्=उसी प्रकार; गौतम=हे गौतमवंशी नचिकेता; विजानतः=(एकमात्र परब्रह्म पुरुषोत्तम ही सब कुछ है, इस प्रकार) जाननेवाले; मुनेः=मुनिका (अर्थात् संसारसे उपरत हुए महापुरुषका), आत्मा=आत्मा, भवति=(ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है ॥ १५ ॥ व्याख्या—परंतु वही वर्षाका निर्मल जल यदि निर्मल जलमें ही बरसता है तो वह उसी क्षण निर्मल जल ही हो जाता है। उसमें न तो कोई विकार उत्पन्न होता है और न वह कहीं बिखरता ही है। इसी प्रकार, हे गौतमवंशीय नचिकेता! जो इस बातको भलीभाँति जान गया है कि जो कुछ है, वह सब परब्रह्म पुरुषोत्तम ही है, उस मननशील—संसारके बाहरी स्वरूपसे उपरत पुरुषका आत्मा परब्रह्ममें मिलकर उसके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १५ ॥ प्रथम वल्ली समाप्त ॥ १ ॥ (४) ❖
- यहाँ 'अङ्गुष्ठमात्र' शब्द परमात्माका वाचक है, जीवका नहीं। प्रात स्मरणीय आचार्यने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है— "परमात्मैवायमङ्गुष्ठमात्रपरिमित पुरुषो भवितुमर्हति । कस्मात् ? शब्दात्—'ईशानो भूतभव्यस्य' इति । न ह्यन्य परमेश्वराद् भूतभव्यस्य निरङ्कुश- मीशिता।" अर्थात् यहाँ अङ्गुष्ठमात्र-परिमाण पुरुष परमात्मा ही है। कैसे जाना ? 'ईशानो' आदि श्रुतिसे। भूत और भव्यका निरङ्कुश नियन्ता परमेश्वरके सिवा दूसरा नहीं हो सकता। (देखिये ब्रह्मसूत्र १। ३। २४ का शाङ्करभाष्य)