कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 243, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 243
- कठोपनिषद् * २२१ द्वितीय वल्ली पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ॥ एतद्वै तत् ॥ १ ॥ अवक्रचेतसः = सरल, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, अजस्य = अजन्मा परमेश्वरका; एकादशद्वारम् = ग्यारह द्वारोंवाला (मनुष्य- शरीररूप), पुरम् = पुर (नगर), (अस्ति) = है (इसके रहते हुए ही), अनुष्ठाय = (परमेश्वरका ध्यान आदि) साधन करके; न शोचति = (मनुष्य) कभी शोक नहीं करता; च = अपि तु, विमुक्तः = जीवन्मुक्त होकर; विमुच्यते = (मरनेके बाद) विदेहमुक्त हो जाता है; एतत् वै = यही है; तत् = वह (परमात्मा, जिसके विषयमें तुमने पूछा था) ॥ १ ॥ व्याख्या—यह मनुष्य-शरीररूपी पुर दो आँख, दो कान, दो नासिकाके छिद्र, एक मुख, ब्रह्मरन्ध्र, नाभि, गुदा और शिश्न—इन ग्यारह द्वारोंवाला है। यह सर्वव्यापी, अविनाशी, अजन्मा, नित्य निर्विकार, एकरस, विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परमेश्वरकी नगरी है। वे सर्वत्र समभावसे सदा परिपूर्ण रहते हुए भी अपनी राजधानीरूप इस मनुष्यशरीरके हृदय-प्रासादमें राजाकी भाँति विशेषरूपसे विराजित रहते हैं। इस रहस्यको समझकर मनुष्यशरीरके रहते हुए ही—जीते-जी जो मनुष्य भजन- स्मरणादि साधन करता है, नगरके महान् स्वामी परमेश्वरका निरन्तर चिन्तन और ध्यान करता है, वह कभी शोक नहीं करता; वह शोकके कारणरूप संसार-बन्धनसे छूटकर जीवन्मुक्त हो जाता है और शरीर छूटनेके पश्चात् विदेहमुक्त हो जाता है— परमात्माका साक्षात्कार करके जन्म मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। यह जो सर्वव्यापक ब्रह्म है, यही वह हैं, जिनके सम्बन्धमें तुमने पूछा था ॥ १ ॥ सम्बन्ध—अब उस परमेश्वरकी सर्वरूपताका स्पष्टीकरण करते हैं— हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसद्दतसद्वयोमसद्बब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ शुचिपत् = जो विशुद्ध परमधाममें रहनेवाला; हंसः = स्वयंप्रकाश पुरुषोत्तम है (वही); अन्तरिक्षसत् = अन्तरिक्षमें निवास करनेवाला; वसुः = वसु है, दुरोणसत् = घरोंमें उपस्थित होनेवाला; अतिथिः = अतिथि है (और), वेदिषत् होता = यज्ञकी वेदीपर स्थापित अग्निरूप तथा उसमें आहुति डालनेवाला 'होता' है (तथा); नृषत् = समस्त मनुष्योंमें रहनेवाला, वरसत् = मनुष्योंसे श्रेष्ठ देवताओंमें रहनेवाला, ऋतसत् = सत्यमें रहनेवाला और; व्योमसत् = आकाशमें रहने- वाला (है तथा); अब्जाः = जलोंमें नाना रूपोंसे प्रकट होनेवाला, गोजाः = पृथिवीमें नानारूपोंसे प्रकट होनेवाला, := सत्कर्मोंमें प्रकट होनेवाला (और); अद्रिजाः = पर्वतोंमें नानारूपसे प्रकट होनेवाला (है), बृहत् ऋतम् = सबसे बड़ा परम सत्य है ॥ २ ॥ व्याख्या—जो प्राकृतिक गुणोंसे सर्वथा अतीत दिव्य विशुद्ध परमधाममें विराजित स्वयंप्रकाश परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं, वही अन्तरिक्षमें विचरनेवाले वसु नामक देवता हैं, वही अतिथिके रूपमें गृहस्थके घरोंमें उपस्थित होते हैं, वही यज्ञकी वेदीपर प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि तथा उसमें आहुति प्रदान करनेवाले होते हैं, वही समस्त मनुष्योंके रूपमें स्थित हैं, मनुष्योंकी अपेक्षा श्रेष्ठ देवता और पितृ आदि रूपमें स्थित, आकाशमें स्थित और सत्यमें प्रतिष्ठित हैं, वही जलोंमे मत्स्य, शङ्ख, शुक्ति आदिके रूपमें प्रकट होते हैं, पृथिवीमे वृक्ष, अङ्कुर, अन्न, ओषधि आदिके रूपमें, यज्ञादि सत्कर्मोंमें नाना प्रकारके यज्ञफलादिके रूपमें और पर्वतोंमें नद-नदी आदिके रूपमे प्रकट होते हैं। वे सभी दृष्टियोंसे सभीकी अपेक्षा श्रेष्ठ, महान् और परम सत्य तत्त्व हैं* ॥२॥
- कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस मन्त्रके ये अर्थ किये हैं— १—जो सर्वथा दोषहीन सर्वरूप 'हंस' हैं (हं चासौ—दोषहीनश्चासौ, सश्च साररूपश्च इति इस ), विशुद्ध (वायु) में स्थित शुचिषद् हैं, अन्तरिक्षमें स्थित सर्वोपरि सुखरूप वसु (व=वर, सु+सुख, यस्य स वसु ) हैं, समस्त इन्द्रियोंके नियन्ता होता हैं, सबके द्वारा सम्मान्य वैद्य वेदिषत् हैं, घरोंमें अतिथि हैं या महान् ऐश्वर्यरूप (अति—महान्, थ—सम्पत्ति-ऐश्वर्य) हैं, सोमरूपसे कलशमें स्थित दुरोणसत् हैं, जो मनुष्योंमें हैं, उनसे श्रेष्ठ देवताओंमें हैं, वेदोंमें ऋत या सत्यरूप हैं, महान् प्रकृतिमें या श्रीमें हैं, जलसे उत्पन्न