भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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२१० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * रखता है और उनके द्वारा मनको रोककर इन्द्रियोंके द्वारा भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार पवित्र कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करता है तथा भगवान्‌को अर्पण किये हुए भोगोंका राग द्वेषसे रहित हो निष्काम भावमे शरीरनिर्वाहके लिये उपभोग करता रहता है, वह परमेश्वरके उस परमधामको प्राप्त कर लेता है, जहाँसे फिर लौटना नहीं होता ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—आठवें मन्त्रम कही हुई बातको फिरसे स्पष्ट करते हुए रूपक रूपकका उपसहार करते हैं— विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९॥ यः नरः =जो (कोई) मनुष्य, विज्ञानसारथिः तु=विवेकशील बुद्धिरूप सारथिने सम्पन्न (और) मनःप्रग्रहवान्= मनरूप लगामको वशमे रखनेवाला है, सः = वह, अध्वनः = संसार-मार्गके, पारम् = पार पहुँचकर, विष्णो = सर्वव्यापक पुरुषोत्तम भगवान्‌के, तत् परमम् पदम् = उस सुप्रसिद्ध परमपदको, आप्नोति= प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या—तृतीय मन्त्रसे नवम मन्त्रतक—सात मन्त्रोम रूपक रूपकम यह बात समझायी गयी है कि यह अति दुर्लभ मनुष्य-शरीर जिस जीवात्माको परमात्माकी कृपासे मिल गया है, उसे शीघ्र सचेत होकर भगवत्प्राप्तिके मार्गमें लग जाना चाहिये। शरीर अनित्य है, प्रतिक्षण इसका ह्रास हो रहा है। यदि अपने जीवनके इस अमूल्य समयको पशुओंकी भाँति सासारिक भोगोंके भोगनेम ही नष्ट कर दिया गया तो फिर बारवार जन्म मृत्युरूप ससारचक्रम घूमनेको बाध्य होना पड़ेगा। जिस महान् कार्यकी सिद्धिके लिये यह दुर्लभ मनुष्य शरीर मिला था, वह पूरा नहीं होगा। अतः मनुष्यको भगवान्‌की कृपासे मिली हुई विवेकशक्तिका उपयोग करना चाहिये। समारकी अनित्यताको ओर इन आपात रमणीय विषय- जनित सुखोंकी यथार्थ दुःखरूपताको समझकर इनके चिन्तन ओर उपभोगसे सर्वथा उपरत हो जाना चाहिये। केवल शरीर- निर्वाहके उपयुक्त कर्तव्यकर्मोंका निष्कामभावमे भगवान्‌की आज्ञा समझकर अनुष्ठान करते हुए अपनी बुद्धिमे भगवान्‌के नाम, रूप, लीला, धाम तथा उनकी अलौकिक शक्ति और अहैतुकी दयापर दृढ विश्वास उत्पन्न करना चाहिये और सर्वतो- भावसे भगवान्‌पर ही निर्भर हो जाना चाहिये। अपने मनको भगवान्‌के तत्त्व चिन्तनमे, वाणीको उनके गुण-वर्णनमें, नेत्रोको उनके दर्शनमे तथा कानोको उनकी महिमा-श्रवणमे लगाना चाहिये । इस प्रकार सारी इन्द्रियोंका सम्बन्ध भगवान्‌से जोड़ देना चाहिये। जीवनका एक क्षण भी भगवान्‌की स्मृतिके बिना न बीतने पाये । इसीमे मनुष्य जीवनकी सार्थकता है। जो ऐसा करता है, वह निश्चय ही परब्रह्म पुरुषोत्तमके अचिन्त्य परमपदको प्राप्त होकर सदाके लिये कृतकृत्य हो जाता है ॥ ९ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त वर्णनमे रथके रूपककी कल्पना करके भगवत्प्राप्तिके लिये जो साधन बतलाया गया, उसमें विवेकशील बुद्धिके द्वारा मनको वशमे करके, इन्द्रियोंको विपरीत मार्गस हटाकर, भगवत्प्राप्तिके मार्गम लगानेकी बात कही गयी। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि स्वभावसे ही दुष्ट और बलवान् इन्द्रियोंको उनके प्रिय ओर अभ्यस्त असत्-मार्गस किस प्रकार हटाया जाय, अतः इस बातका तात्त्विक विवेचन करके इन्द्रियोंको असत्-मार्गसे रोककर भगवान्‌की ओर लगानेका प्रकार बतलाते हैं— इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ हि इन्द्रियेभ्यः=क्योंकि इन्द्रियोमे, अर्थाः=शब्दादि विषय, पराः च=बलवान् हैं ओर, अर्थेभ्यः=शब्दादि विषयोंसे, मनः=मन, परम्=पर (प्रबल) हे तु मनसः=और मनसे भी, बुद्धिः=बुद्धि, परा=पर (बलवती) हे; बुद्धेः= (तथा) बुद्धिसे, महान् आत्मा=महान् आत्मा, (उन सबका स्वामी होनेके कारण); परः=अत्यन्त श्रेष्ठ और बलवान् है ॥१०॥ व्याख्या-इस मन्त्रमे 'पर' शब्दका प्रयोग बलवान्‌के अर्थम हुआ है, यह बात समझ लेनी चाहिये, क्योंकि कार्य- कारणभावसे या सूक्ष्मतारी दृष्टिमे इन्द्रियोंकी अपेक्षा शब्दादि विषयोंको श्रेष्ठ बतलाना युक्तियुक्त नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार 'महान्' विशेषणके सहित 'आत्मा' शब्द भी 'जीवात्मा'का वाचक है, 'महत्तत्त्व'का नहीं। जीवात्मा उन सबका स्वामी है, अतः उसके लिये 'महान्' विशेषण देना उचित ही है। यदि महत्तत्त्वके अर्थमें इसका प्रयोग होता तो 'आत्मा' शब्दके प्रयोगकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। दूसरी बात यह भी है कि बुद्धि तत्त्व ही महत्तत्त्व है। तत्त्व-विचारकालमें