भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 832 में से

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पृष्ठ 231

ॐ कठोपनिषद् ॐ २०९ खींचकर उन्हें अपने वशमें कर लेता है तो फिर घोड़े मनरूपी लगामके सहारे बिना चाहे जिस ओर नहीं जा सकते। यह सभी जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण तभी कर सकती हैं, जब मन उनके साथ होता है। घोड़े उसी ओर दौड़ते हैं, जिस ओर लगामका सहारा होता है; पर इस लगामको ठीक रखना सारथिकी बलबुद्धिपर निर्भर करता है। यदि बुद्धिरूपी सारथि विवेकयुक्त, स्वामीका आज्ञाकारी, लक्ष्यपर सदा स्थिर, बलवान्, मार्गके ज्ञानसे सम्पन्न और इन्द्रियरूपी घोड़ोंको चलानेमें दक्ष नहीं होता तो इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़े उसके वशमें न रहकर लगामके सहारे सारे रथको ही अपने वशमें कर लेते हैं और फलस्वरूप रथी और सारथिसमेत उस रथको लिये हुए गहरे गड्ढेमें गिर पड़ते हैं। बुद्धिके नियन्त्रणसे रहित इन्द्रियाँ उत्तरोत्तर उच्छृङ्खल ही होती चली जाती हैं ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब स्वयं सावधान रहकर अपनी बुद्धिको विवेकशील बनानेसे होनेवाला लाभ बतलाते हैं--- यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ तु यः सदा=परन्तु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकयुक्त बुद्धिवाला (और); युक्तेन=वशमें किये हुए; मनसा=मनसे सम्पन्न; भवति=रहता है; तस्य=उसकी; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; सारथेः=सावधान सारथिके; सदश्वाः इव=अच्छे घोड़ोंकी भाँति; वश्यानि=वशमें; [ भवन्ति=रहती हैं ] ॥ ६ ॥ व्याख्या-जो जीवात्मा अपनी बुद्धिको विवेकसम्पन्न बना लेता है—जिसकी बुद्धि अपने लक्ष्यकी ओर ध्यान रखती हुई नित्य निरन्तर निपुणताके साथ इन्द्रियोंको सन्मार्गपर चलानेके लिये मनको बाध्य किये रखती है, उसका मन भी लक्ष्यकी ओर लगा रहता है एवं उसकी इन्द्रियाँ निश्चयात्मिका बुद्धिके अधीन रहकर भगवत्सम्बन्धी पवित्र विषयोंके सेवनमें उसी प्रकार संलग्न रहती हैं, जैसे श्रेष्ठ अश्व सावधान सारथिके अधीन रहकर उसके निर्दिष्ट मार्गपर चलते हैं ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-पाँचवें मन्त्रके अनुसार जिसके बुद्धि और मन आदि विवेक और संयमसे हीन होते हैं, उसकी क्या गति होती है— इसे बतलाते हैं-- यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः । न स तत्पदमाप्नोति सँसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ यः तु सदा=जो कोई सदा; अविज्ञानवान्=विवेकहीन बुद्धिवाला; अमनस्कः=असंयतचित्त और; अशुचिः= अपवित्र; भवति=रहता है; सः तत्पदम्=वह उस परमपदको; न आप्नोति=नहीं पा सकता; च=अपितु; संसारम् अधिगच्छति=बार-बार जन्म मृत्युरूप संसार-चक्रमें ही भटकता रहता है ॥ ७ ॥ व्याख्या-जिसकी बुद्धि सदा ही विवेक—कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे रहित और मनको वशमें रखनेम असमर्थ रहती है, जिसका मन निग्रहरहित—असंयत और जिसका विचार दूषित रहता है और जिसकी इन्द्रियाँ निरन्तर दुराचारमें प्रवृत्त रहती हैं, ऐसे बुद्धिशक्तिम रहित मन इन्द्रियोंके वशमें रहनेवाले मनुष्यका जीवन कभी पवित्र नहीं रह पाता और इसलिये वह मानव शरीरसे प्राप्त होनेयोग्य परमपदको नहीं पा सकता, वर अपने दुष्कर्मोंके परिणामस्वरूप अनवरत इस संसार चक्रमें ही भटकता रहता है—शूकर-कुकुरादि विभिन्न योनियोंमें जन्मता एवं मरता रहता है ॥ ७ ॥ यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते ॥ ८ ॥ तु यः सदा=परन्तु जो सदा; विज्ञानवान्=विवेकशील बुद्धिसे युक्त; समनस्कः=संयतचित्त (और); शुचिः=पवित्र; भवति=रहता है; सः तु=वह तो; तत्पदम्=उस परमपदको; आप्नोति=प्राप्त हो जाता है; यस्मात् भूयः=जहाँसे (लौटकर) पुनः; न जायते=जन्म नहीं लेता ॥ ८ ॥ व्याख्या-इसके विपरीत जो छठे मन्त्रके अनुसार स्वयं सावधान होकर अपनी बुद्धिको निरन्तर विवेकशील बनाये