कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें२०८ * विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध—अब उस परब्रह्म पुरुषोत्तमके परमधाममें किन साधनोंसे सम्पन्न मनुष्य पहुँच सकता है, यह बात रथ और रथी- के रूपककी कल्पना करके समझायी जाती है— आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ आत्मानम्=( हे नचिकेता ! तुम ) जीवात्माको तो; रथिनम्=रथका स्वामी ( उसमें बैठकर चलनेवाला ); विद्धि=समझो, तु=और, शरीरम् एव=शरीरको ही, रथम्=रथ ( समझो ), तु बुद्धिम्=तथा बुद्धिको, सारथिम्=सारथि ( रथको चलानेवाला ), विद्धि=समझो, च मनः एव=और मनको ही, प्रग्रहम्=लगाम ( समझो ) ॥ ३ ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ मनीषिणः=ज्ञानीजन ( इस रूपकमें ); इन्द्रियाणि=इन्द्रियोंको; हयान्=घोड़े; आहुः=बतलाते हैं ( और ); विषयान्=विषयोंको; तेषु गोचरान्=उन घोड़ोंके विचरनेका मार्ग ( बतलाते हैं ), आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्=( तथा ) शरीर, इन्द्रिय और मन—इन सबके साथ रहनेवाला जीवात्मा ही, भोक्ता=भोक्ता है; इति आहुः=यों कहते हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—जीवात्मा परमात्मासे बिछुड़ा हुआ है अनन्त कालसे, यह अनवरत संसाररूपी वीहड़ वनमें इधर-उधर सुखकी खोजमें भटक रहा है। सुख समझकर जहाँ भी जाता है, वहीं धोखा खाता है। सर्वथा साधनहीन और दयनीय है। जबतक वह परम सुखरूप परमात्माके समीप नहीं पहुँच जाता, तबतक उसे सुख शान्ति कभी नहीं मिल सकती । उसकी इस दयनीय दशाको देखकर दयामय परमात्माने उसे मानव-शरीररूपी सुन्दर सर्वसाधनसम्पन्न रथ दिया। इन्द्रियरूप बलवान् घोड़े दिये। उनके मनरूपी लगाम लगाकर उसे बुद्धिरूपी सारथिके हाथोंमें सौंप दिया और जीवात्माको उस रथमे बैठाकर—उसका स्वामी बनाकर यह बतला दिया कि वह निरन्तर बुद्धिको प्रेरणा करता रहे और परमात्माकी ओर ले जानेवाले भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाम आदिके श्रवण, कीर्तन, मननादि विषयरूप प्रशस्त और सहज मार्गपर चलकर शीघ्र परमात्माके धाममे पहुँच जाय । जीवात्मा यदि ऐसा करता तो वह शीघ्र ही परमात्मातक पहुँच जाता, परन्तु वह अपने परमानन्दमय भगवत्प्राप्तिरूप इस महान् लक्ष्यको मोहवश भूल गया। उसने बुद्धिको प्रेरणा देना बंद कर दिया, जिससे बुद्धिरूपी सारथि असावधान हो गया, उसने मनरूपी लगामको इन्द्रियरूपी दुष्ट घोड़ोंकी इच्छापर छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ कि जीवात्मा विषयप्रवण इन्द्रियोंके अधीन होकर सतत संसारचक्रमें डालनेवाले लौकिक शब्द स्पर्शादि विषयोंमें भटकने लगा। अर्थात् वह जिन शरीर, इन्द्रिय, मनके सहयोगसे भगवान्को प्राप्त करता, उन्हींके साथ युक्त होकर वह विषय विषके उपभोगमे लग गया ॥ ३-४ ॥ सम्बन्ध—परमात्माकी ओर न जाकर उसकी इन्द्रियाँ लौकिक विषयोंमें क्यों लग गयीं, इसका कारण बतलाते हैं— यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ यः सदा=जो सदा, अविज्ञानवान् तु=विवेकहीन बुद्धिवाला ( और ), अयुक्तेन=अवशीभूत ( चञ्चल ), मनसा= मनसे ( युक्त ), भवति=रहता है, तस्य=उसकी, इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ, सारथेः=असावधान सारथिके, दुष्टाश्वाः इव= दुष्ट घोड़ोंकी भाँति, अवश्यानि=वशमें न रहनेवाली, [ भवन्ति=हो जाती हैं ] ॥ ५ ॥ व्याख्या—रथको घोड़े ही चलाते हैं, परन्तु उन घोड़ोंको चाहे जिस ओर, चाहे जिस मार्गपर ले जाना—लगाम हाथमें थामे हुए बुद्धिमान् सारथिका काम है। इन्द्रियरूपी बलवान् और दुर्धर्ष घोड़े स्वाभाविक ही आपात रमणीय विषयोंसे भरे संसाररूप हरी-हरी घासके जगलकी ओर मनमाना दौड़ना चाहते हैं, परन्तु यदि बुद्धिरूप सारथि मनरूपी लगामको जोरसे