भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 832 में से

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पृष्ठ 228

२०६ * महान्तं विभुमात्मानं मंत्व धीरो न शोचति * प्रज्ञानेन=सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा, अपि=भी, एनम्=इस परमात्माको, न दुश्चरितात् अविरतः आप्नुयात्=न तो वह मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो बुरे आचरणोंसे निवृत्त नहीं हुआ है; न अशान्तः=न वह प्राप्त कर सकता है, जो अशान्त है; न असमाहितः=न वह कि जिसके मन, इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, वा=और; न अशान्तमानसः (आप्नुयात् )=न वही प्राप्त करता है, जिसका मन चञ्चल है ॥ २४ ॥ व्याख्या - जो मनुष्य बुरे आचरणोंसे घृणा करके उनका त्याग नहीं कर देता, जिसका मन परमात्माको छोड़कर दिन-रात सांसारिक भोगोंमे भटकता रहता है, परमात्मापर विश्वास न होनेके कारण जो सदा अशान्त रहता है, जिसका मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ वशमें की हुई नहीं हैं, ऐसा मनुष्य सूक्ष्म बुद्धिद्वारा आत्मविचार करते रहनेपर भी परमात्माको नहीं पा सकता। क्योंकि वह परमात्माकी असीम कृपाका आदर नहीं करता, उसकी अवहेलना करता रहता है, अतः वह उनकी कृपाका अधिकारी नहीं होता ॥ २४ ॥ सम्बन्ध - उस परब्रह्म परमेश्वरके तत्त्वको सुनकर और बुद्धिद्वारा विचार करके भी मनुष्य उसे क्या नहीं जान सकता ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५॥ यस्य=(संहारकालमे) जिस परमेश्वरके, ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे=ब्राह्मण और क्षत्रिय-ये दोनों ही अर्थात् सम्पूर्ण प्राणि- मात्र, ओदनः भोजन, भवतः=बन जाते हैं (तथा), मृत्युः यस्य=सबका संहार करनेवाली मृत्यु (भी) जिसका, उप- सेचनम्=उपसेचन (भोज्य वस्तुके साथ लगाकर खानेका व्यञ्जन, तरकारी आदि), [ भवति =बन जाती है, ] सः यत्र=वह परमेश्वर जहाँ (और), इत्था=जैसा है, यह ठीक ठीक, कः वेद=कौन जानता है ॥ २५ ॥ व्याख्या - मनुष्य-शरीरमे भी धर्मशील ब्राह्मण और धर्मरक्षक क्षत्रियका शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये अधिक उत्तम माना गया है, किंतु वे भी उन कालस्वरूप परमेश्वरके भोजन बन जाते हैं, फिर अन्य साधारण मनुष्य शरीरोंकी तो बात ही क्या है। जो सबको मारनेवाले मृत्युदेव है, वे भी उन परमेश्वरके उपसेचन अर्थात् भोजनके साथ लगाकर खाये जानेवाले व्यञ्जन—चटनी-तरकारी आदिकी भाँति हैं। ऐसे ब्राह्मण-क्षत्रियादि समस्त प्राणियोंके और स्वयं मृत्युके संहारक अथवा आश्रयदाता परमेश्वरको भला, कोई भी मनुष्य इन अनित्य मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अन्य ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति कैसे जान सकता है। किसकी सामर्थ्य है, जो सबके जाननेवालेको जान ले। अतः (पूर्वोक्त २३ वें मन्त्रके अनुसार ) जिसको परमात्मा अपनी कृपाका पात्र बनाकर अपना तत्त्व समझाना चाहते हैं, वही उनको जान सकता है। अपनी शक्तिसे उन्हें कोई भी यथार्थ रूपमे नहीं जान सकता, क्योंकि वे लौकिक ज्ञेय वस्तुओंकी भाँति बुद्धिके द्वारा जाननेमे आनेवाले नहीं हैं ॥ २५ ॥ ॥ द्वितीय वल्ली समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय वल्ली सम्बन्ध-द्वितीय वल्लीमें जीवात्मा और परमात्माके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन किया गया और उनको जानकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेनेका फल भी बतलाया गया। संक्षेपमें यह बात भी कही गयी कि जिसको वे परमात्मा स्वीकार करते हैं, वही उन्हें जान सकता है, परंतु परमात्माको प्राप्त करनेके साधनोंका वहाँ स्पष्टरूपसे वर्णन नहीं हुआ, अत साधनोंका वर्णन करनेके लिये तृतीय वल्ली- का आरम्भ करते हुए यमराज पहले मन्त्रमें जीवात्मा और परमात्माका नित्य सम्बन्ध और निवास-स्थान बतलाते हैं- ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥ ही जाना जा सकता है । साधक जिस आत्माका वरण करता है, उस वरण करनेवाले आत्माके द्वारा यह आत्मा स्वय ही प्राप्त किया जाता है । उस आत्माभावीके प्रति वह आत्मा अपने पारमार्थिक स्वरूपको यथार्थ रूपमें प्रकट कर देता है ।