भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 832 में से

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पृष्ठ 206

१८६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * प्रतिप्रस्थाता, ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा आधी; अच्छावाक, नेष्टा, आग्नीध्र और प्रतिहर्त्ता—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा तिहाई एवं ग्रावस्तुत्, नेता, होता और सुब्रह्मण्य—इन चार गौण ऋत्विजोंको मुख्य ऋत्विजोंकी अपेक्षा चौथाई गौएँ दी जाती हैं। नियमानुसार जब इन सबको दक्षिणाके रूपमें देनेके लिये गौएँ लायी जा रही थीं; उस समय बालक नचिकेताने उनको देख लिया। उनकी दयनीय दशा देखते ही उसके निर्मल अन्तःकरणमे श्रद्धा—आस्तिकताने प्रवेश किया और वह सोचने लगा—॥ २ ॥ पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः। अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ ३॥ पीतोदकाः=जो (अन्तिम बार) जल पी चुकी हैं; जग्धतृणाः=जिनका घास खाना समाप्त हो गया है; दुग्धदोहाः=जिनका दूध (अन्तिम बार) दुह लिया गया है; निरिन्द्रियाः=जिनकी इन्द्रियाँ नष्ट हो चुकी हैं; ताः=ऐसी (निरर्थक मरणासन्न) गौओंको; ददत्=देनेवाला; सः=वह दाता (तो), ते लोकाः=वे (शूकर-कूकरादि नीच योनियाँ और नरकादि) लोक; अनन्दाः=जो सब प्रकारके सुखोंसे शून्य; नाम=प्रसिद्ध हैं; तान्=उनको; गच्छति=प्राप्त होता है (अतः पिताजीको सावधान करना चाहिये) ॥ ३ ॥ स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति। द्वितीयं तृतीयं तँहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥ सः ह=यह सोचकर वह; पितरम्=अपने पितासे; उवाच=बोला कि; तत (तात)=हे प्यारे पिताजी !; माम्=मुझे; कस्मै=(आप) किसको; दास्यसि इति=देंगे ?; (उत्तर न मिलनेपर उसने वही बात) द्वितीयम्=दुबारा; तृतीयम्=तिबारा (कही); तम् ह=(तब पिताने) उससे; उवाच=(इस प्रकार क्रोधपूर्वक) कहा; त्वा=तुझे (मैं); मृत्यवे=मृत्युको; ददामि इति=देता हूँ ॥ ४ ॥ व्याख्या—पिताजी ये कैसी गौएँ दक्षिणामें दे रहे हैं। अब इनमें न तो झुककर जल पीनेकी शक्ति रही है, न इनके मुखमें घास चबानेके लिये दाँत ही रह गये हैं और न इनके स्तनोंमें तनिक-सा दूध ही बचा है। अधिक क्या, इनकी तो इन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट हो चुकी हैं—इनमें गर्भधारण करनेतककी भी सामर्थ्य नहीं है! भला, ऐसी निरर्थक और मृत्युके समीप पहुँची हुई गौएँ जिन ब्राह्मणोंके घर जायँगी, उनको दुःखके सिवा ये और क्या देंगी ? दान तो उसी वस्तुका करना चाहिये, जो अपनेको सुख देनेवाली हो, प्रिय हो और उपयोगी हो तथा वह जिनको दी जाय उन्हें भी सुख और लाभ पहुँचानेवाली हो। दुःखदायिनी अनुपयोगी वस्तुओको दानके नामपर देना तो दानके व्याजसे अपनी विपद् टालना है और दान ग्रहण करनेवालोको धोखा देना है। इस प्रकारके दानसे दाताको वे नीच योनियाँ और नरकादि लोक मिलते हैं, जिनमें सुखका कहीं लेश भी नहीं है। पिताजी इस दानसे क्या सुख पायेंगे ? यह तो यज्ञमें वैगुण्य है, जो इन्होंने सर्वस्व-दानरूपी यज्ञ करके भी उपयोगी गौओंको मेरे नामपर रख लिया है; और सर्वस्वमे तो मैं भी हूँ, मुझको तो इन्होंने दानमे दिया नहीं। पर मैं इनका पुत्र हूँ, अतएव मैं पिताजीको इस अनिष्टकारी परिणामसे बचानेके लिये अपना बलिदान कर दूँगा। यही मेरा धर्म है। यह निश्चय करके उसने अपने पितासे कहा—'पिताजी ! मैं भी तो आपका धन हूँ, आप मुझे किसको देते हैं ?' पिताने कोई उत्तर नहीं दिया, तब नचिकेताने फिर कहा—'पिताजी ! मुझे किसको देते हैं ?' पिताने इस बार भी उपेक्षा की। पर धर्मभीरु और पुत्रका कर्तव्य जाननेवाले नचिकेतासे नहीं रहा गया। उसने तीसरी बार फिर वही कहा—'पिताजी ! आप मुझे किसको देते हैं ?' अब ऋषिको क्रोध आ गया और उन्होंने आवेशमें आकर कहा—'तुझे देता हूँ मृत्युको !' ॥ ३-४ ॥ सम्बन्ध—यह सुनकर नचिकेता मन-ही-मन विचारने लगा कि— बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः। किँस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५॥ बहूनाम्=मैं बहुत-से शिष्योंमें तो; प्रथमः=प्रथम श्रेणीके आचरणपर; एमि=चलता आया हूँ (और); बहूनाम्= *, मध्यमः=मध्यम श्रेणीके आचारपर; एमि=चलता हूँ (कभी भी नीची श्रेणीके आचरणको मैंने नहीं अपनाया, फिर

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