कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 204, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जो कुछ उपदेश किया है, तुम यह दृढरूपसे समझ लो कि वह सुनिश्चित रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका ही उपदेश है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध - ब्रह्मविद्याके सुननेमात्रसे ही ब्रह्मके स्वरूपका रहस्य समझमें नहीं आता, इसके लिये विशेष साधनोंकी आवश्यकता होती है, इसलिये अब उन प्रधान साधनोंका वर्णन करते हैं- तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥ तस्यै=उस रहस्यमयी ब्रह्मविद्याके; तपः=तपस्या; दमः=मन इन्द्रियोंका नियन्त्रण; कर्म=निष्काम कर्म, इति=ये तीनों, प्रतिष्ठाः=आधार हैं; वेदाः=वेद; सर्वाङ्गानि =उस विद्याके सम्पूर्ण अङ्ग हैं अर्थात् वेदमे उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका सविस्तर वर्णन है; सत्यम् = सत्यस्वरूप परमेश्वर, आयतनम् = उसका अधिष्ठान - प्राप्तव्य है ॥ ८ ॥ व्याख्या-सुन-पढकर रट लिया और ब्रह्मज्ञानी हो गये । यह तो ब्रह्मविद्याका उपहास है और अपने-आपको धोखा देना है । ब्रह्मविद्यारूपी प्रासादकी नींव है - तप, दम और कर्म आदि साधन । इन्हींपर वह रहस्यमयी ब्रह्मविद्या स्थिर हो सकती है। जो साधक साधन-सम्पत्तिकी रक्षा, वृद्धि तथा स्वधर्मपालनके लिये कठिन-से कठिन कष्टको सहर्ष स्वीकार नहीं करते, जो मन और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमे नहीं कर लेते और जो निष्कामभावसे अनासक्त होकर वर्णाश्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मका अनुष्ठान नहीं करते, वे ब्रह्मविद्याका यथार्थ रहस्य नहीं जान पाते; क्योंकि ये ही उसे जाननेके प्रधान आधार हैं । साथ ही यह भी जानना चाहिये कि वेद उस ब्रह्मविद्याके समस्त अङ्ग हैं। वेदमे ही ब्रह्मविद्याके समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गोंकी विशद व्याख्या है, अतएव वेदोंका उसके अङ्गोंसहित अध्ययन करना चाहिये । और सत्यस्वरूप परमेश्वर अर्थात् त्रिकालाबाधित सच्चिदानन्दघन परमेश्वर ही उस ब्रह्मविद्याका परम अधिष्ठान, आश्रयस्थल और परम लक्ष्य है। अतएव उस ब्रह्मको लक्ष्य करके जो वेदानुसार उसके तत्त्वका अनुशीलन करते हुए तप, दम और निष्काम कर्म आदिका आचरण करते हुए साधन करते हैं, वे ही ब्रह्मविद्याके सार रहस्य परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त कर सकते हैं ॥ ८ ॥ यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्टति प्रतितिष्ठति ॥ ९॥ यः=जो कोई भी, एताम् वै=इस प्रसिद्ध ब्रह्मविद्याको; एवम्=पूर्वोक्त प्रकारसे भलीभाँति; वेद=जान लेता है; [सः=वह,] पाप्मानम् = समस्त पापसमूहको; अपहत्य=नष्ट करके, अनन्ते=अविनाशी, असीम, ज्येये=सर्वश्रेष्ठ, स्वर्गे लोके=परम धाममें' प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित हो जाता है, प्रतितिष्ठति =सदाके लिये स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥ व्याख्या- ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे जो उपनिषद्रूपा ब्रह्मविद्याके रहस्यको जान लेता है अर्थात् तदनुसार साधनमें प्रवृत्त हो जाता है, वह समस्त पापोंका - परमात्म-साक्षात्कारमें प्रतिबन्धकरूप समस्त शुभाशुभ कर्मोंका अशेषरूपमे नाश करके नित्य-सत्य सर्वश्रेष्ठ परमधाममे स्थित हो जाता है, कभी वहाँसे लौटता नहीं, सदाके लिये वहाँ प्रतिष्ठित हो जाता है । यहाँ 'प्रतितिष्ठति'पदका पुनः उच्चारण ग्रन्थ-समाप्तिका सूचक तो है ही, साथ ही उपदेशकी निश्चितताका प्रतिपादक भी है ॥ ९ ॥ ॥ चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ ४ ॥ ॥ सामवेदीय केनोपनिषद् समाप्त ॥ +---०००---+ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः इसका अर्थ केनोपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।