कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 203, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 203
- केनोपनिषद् * १८३ गोपनीय रीतिसे ऐसे शब्दोंमें ब्रह्मतत्त्वका संकेत किया गया है कि जिसे कोई अनुभवी सन्त-महात्मा ही बतला सकते हैं । शब्दोंका अर्थ तो अपनी-अपनी भावनाके अनुसार विभिन्न प्रकारसे लगाया जा सकता है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध- अब इसी बातको आध्यात्मिक भावसे समझाते हैं— अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं संकल्पः ॥ ५ ॥ अथ = अब; अध्यात्मम् = आध्यात्मिक (उदाहरण दिया जाता है), यत् = जो कि, मनः = (हमारा) मन, एतत् = इस (ब्रह्म) के समीप, गच्छति इव = जाता हुआ-सा प्रतीत होता है, च = तथा, एतत् = इस ब्रह्मको, अभीक्ष्णम् = निरन्तर, उपस्मरति = अतिशय प्रेमपूर्वक स्मरण करता है, अनेन = इस मनके द्वारा (ही), संकल्पः च = संकल्प अर्थात् उस ब्रह्मके साक्षात्कारकी उत्कट अभिलाषा भी (होती है) ॥ ५ ॥ व्याख्या- जब साधकको अपना मन आराध्यदेव श्रीभगवान्के समीपतक पहुँचता हुआ-सा दीखता है, वह अपने मनसे भगवान्के निर्गुण या सगुण—जिस स्वरूपका भी चिन्तन करता है, उसकी जब प्रत्यक्ष अनुभूति सी होती है, तब स्वाभाविक ही उसका अपने उस इष्टमें अत्यन्त प्रेम हो जाता है । फिर वह क्षणभरके लिये भी अपने इष्टदेवकी विस्मृतिको सहन नहीं कर सकता । उस समय वह अतिशय व्याकुल हो जाता है ('तद्विस्मरणे परमव्याकुलता'—नारदभक्तिसूत्र १९) । वह नित्य-निरन्तर प्रेमपूर्वक उसका स्मरण करता रहता है और उसके मनमें अपने इष्टको प्राप्त करनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है । पिछले मन्त्रमें जो बात आधिदैविक दृष्टिसे कही गयी थी, वही इसमें आध्यात्मिक दृष्टिसे कही गयी है ॥ ५ ॥ सम्बन्ध- अब उस ब्रह्मकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलाते हैं— तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैन सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥६॥ तत् = वह परब्रह्म परमात्मा, तद्वनम् = (प्राणिमात्रका प्रापणीय होनेके कारण) 'तद्वन', नाम ह = नामसे प्रसिद्ध है, (अतः) तद्वनम् = वह आनन्दघन परमात्मा प्राणिमात्रकी अभिलाषाका विषय और सबका परम प्रिय है, इति = इस भावसे, उपासितव्यम् = उसकी उपासना करनी चाहिये; सः यः = वह जो भी साधक, एतत् = उस ब्रह्मको, एवम् = इस प्रकार (उपासनाके द्वारा), वेद = जान लेता है, एनम् ह = उसको निस्सन्देह, सर्वाणि = सम्पूर्ण, भूतानि = प्राणी; अभि = सब ओरसे, संवाञ्छन्ति = हृदयसे चाहते हैं अर्थात् वह प्राणिमात्रका प्रिय हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या- वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सभीका अत्यन्त प्रिय है। सभी प्राणी किसी न-किसी प्रकारसे उसी को चाहते हैं, परंतु पहचानते नहीं; इसीलिये वे सुखके रूपमें उसे खोजते हुए दुःखरूप विषयोंमें भटकते रहते हैं, उसे पा नहीं सकते । इस रहस्यको समझकर साधकको चाहिये कि उस परब्रह्म परमात्माको प्राणिमात्रका प्रिय समझकर उसके नित्य अचल अमल अनन्त परम आनन्दस्वरूपका नित्य-निरन्तर चिन्तन करता रहे । ऐसा करते-करते जब वह आनन्दस्वरूप सर्वप्रिय परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, तब वह स्वयं भी आनन्दमय हो जाता है । अतः जगत्के सभी प्राणी उसे अपना परम आत्मीय समझकर उसके साथ हृदयसे प्रेम करने लगते हैं ॥ ६ ॥ उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद् ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥ भोः = हे गुरुदेव; उपनिषदम् = ब्रह्मसम्बन्धी रहस्यमयी विद्याका, ब्रूहि = उपदेश कीजिये, इति = इस प्रकार (शिष्यके प्रार्थना करनेपर गुरुदेव कहते हैं कि), ते = तुझको (हमने), उपनिषत् = रहस्यमयी ब्रह्मविद्या, उक्ता = बतला दी, ते = तुझको (हम), वाव = निश्चय ही, ब्राह्मीम् = ब्रह्मविषयक, उपनिषदम् = रहस्यमयी विद्या, अब्रूम = बतला चुके हैं। इति = इस प्रकार (तुम्हें समझना चाहिये) ॥ ७ ॥ व्याख्या- गुरुदेवसे सांकेतिक भाषामें ब्रह्मविद्याका श्रेष्ठ उपदेश सुनकर शिष्य उसको पूर्णरूपसे हृदयङ्गम नहीं कर सका, इसलिये उसने प्रार्थना की कि 'भगवन् ! मुझे उपनिषद्—रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये ।' इसपर गुरुदेवने कहा—'वत्स ! हम तुम्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश कर चुके हैं । तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' से लेकर उपर्युक्त मन्त्रतक