कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—समस्त देवताओंमें अग्नि, वायु और इन्द्रको ही परम श्रेष्ठ मानना चाहिये, क्योंकि उन्हीं तीनोंने ब्रह्मका संस्पर्श प्राप्त किया है। परब्रह्म परमात्माके दर्शनका, उनका परिचय प्राप्त करनेके प्रयत्नमें प्रवृत्त होनेका और उनके साथ वार्तालापका परम सौभाग्य उन्हीं को प्राप्त हुआ और उन्होंने ही सबने पहले इस सत्यको समझा कि हमलोगोंने जिनका दर्शन प्राप्त किया है, जिनसे वार्तालाप किया है और जिनकी शक्तिसे असुरोंपर विजय प्राप्त की है, वे ही साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं। सारांश यह कि जिन सौभाग्यशाली महापुरुषोंको किसी भी कारणसे भगवान्के दिव्य संस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त हो गया है, जो उनके दर्शन, स्पर्श और उनके साथ सदालाप करनेका सुअवसर पा चुके हैं, उनकी महिमा इस मन्त्रमें इन्द्रादि देवताओंका उदाहरण देकर की गयी है ॥ २ ॥ सम्बन्ध—अब यह कहते हैं कि इन तीनों देवताओंमें भी अग्नि और वायुकी अपेक्षा देवराज इन्द्र श्रेष्ठ हैं— तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श, स ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥ तस्मात् वै = इसीलिये, इन्द्रः = इन्द्र, अन्यान् देवान् = दूसरे देवताओंकी अपेक्षा; अतितराम् इव = मानो अतिशय श्रेष्ठ है, हि = क्योंकि, स = उसने, एनत् नेदिष्ठम् = इन अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको पस्पर्श = (उमादेवीसे सुनकर सबसे पहले) मनके द्वारा स्पर्श किया, स हि = (और) उसीने, एनत् = इनको; प्रथमः = अन्यान्य देवताओंमे पहले विदाञ्चकार = भलीभाँति जाना है (कि), ब्रह्म इति = ये साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—अग्नि तथा वायुने दिव्य यक्षके रूपमे ब्रह्मका दर्शन और उसके साथ वार्तालापका सौभाग्य तो प्राप्त किया था, परन्तु उन्हें उसके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ था। भगवती उमाके द्वारा सबसे पहले देवराज इन्द्रको सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वका ज्ञान हुआ। तदनन्तर इन्द्रके बतलानेपर अग्नि और वायुको उनके स्वरूपका पता लगा और उसके बाद इनके द्वारा अन्य सब देवताओंने यह जाना कि हमें जो दिव्य यक्ष दिखलायी दे रहे थे, वे साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हैं। इस प्रकार अन्यान्य देवताओने केवल सुनकर जाना, परंतु उन्हें परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ न तो वार्तालाप करनेका सौभाग्य मिला और न उनके तत्त्वको समझनेका ही। अतएव उन सब देवताओंसे तो अग्नि, वायु और इन्द्र श्रेष्ठ हैं, क्योंकि इन तीनोंको ब्रह्मका दर्शन और तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई। परंतु इन्द्रने सबसे पहले उनके तत्त्वको समझा, इसलिये इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—अब उपर्युक्त ब्रह्मतत्त्वको आधिदैविक दृष्टान्तके द्वारा सङ्केतसे समझाते हैं— तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा इतीन्त्यमीमिपदा इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥ तस्य = उस ब्रह्मका, एष = यह, आदेशः = साङ्केतिक उपदेश है, यत् = जो कि, एतत् = यह, विद्युतः = बिजलीका, व्यद्युतत् आ = चमकना-सा है, इति = इस प्रकार (क्षणस्थायी है), इत् = तथा जो, न्यमीमिपत् आ = नेत्रोंका झपकना-सा है; इति = इस प्रकार, अधिदैवतम् = यह आधिदैविक उपदेश है ॥ ४ ॥ व्याख्या—जब साधकके हृदयमें ब्रह्मको साक्षात् करनेकी तीव्र अभिलाषा जाग उठती है, तब भगवान् उसकी उत्कण्ठाको और भी तीव्रतम तथा उत्कट बनानेके लिये बिजलीके चमकने और आँखोंके झपकनेकी भाँति अपने स्वरूपकी क्षणिक झाँकी दिखलाकर छिप जाया करते हैं। पूर्वोक्त आख्यायिकामें इसी प्रकार इन्द्रके सामनेसे दिव्य यक्षके अन्तर्धान हो जानेकी बात आयी है। देवर्षि नारदको भी उनके पूर्वजन्ममें क्षणभरके लिये अपनी दिव्य झाँकी दिखलाकर भगवान् अन्तर्धान हो गये थे। यह कथा श्रीमद्भागवत (स्क० १। ६। १९-२०) में आती है। जब साधकके नेत्रोंके सामने या उसके हृदय देशमें पहले-पहल भगवान्के साकार या निराकार स्वरूपका दर्शन या अनुभव होता है, तब वह आनन्दाश्चर्यसे चकित-सा हो जाता है। इससे उसके हृदयमें अपने आराध्यदेवको नित्य-निरन्तर देखते रहने या अनुभव करते रहनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। फिर उसे क्षणभरके लिये भी इष्ट-साक्षात्कारके बिना शान्ति नहीं मिलती। यही बात इस मन्त्रमे आधिदैविक उदाहरणसे समझायी गयी है—ऐसा प्रतीत होता है। वस्तुतः यहाँ वही ही