भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 832 में से

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पृष्ठ 201
  • केनोपनिषद् * १८१ वार्तालापका तो अवसर नहीं दिया । परन्तु इस एक दोषके अतिरिक्त अन्य सब प्रकारसे इन्द्र अधिकारी थे, अतः उन्हे ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान कराना आवश्यक समझकर इसीकी व्यवस्थाके लिये वे स्वयं अन्तर्धान हो गये ॥ ११ ॥ स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमा ँ हैमवतीं ताँ्होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥१२॥ सः = वे इन्द्र; तस्मिन् एव = उसी, आकाशे = आकाशप्रदेशमे (यक्षके स्थानपर ही), बहुशोभमानाम् = अतिशय सुन्दरी, स्त्रियम् = देवी, हैमवतीम् = हिमाचलकुमारी; उमाम् = उमाके पास; आजगाम = आ पहुँचे ( और ), ताम् = उनमे; ह उवाच = ( सादर ) यह बोले ( देवि ! ), एतत् = यह; यक्षम् = दिव्य यक्ष; किम् इति = कौन था ॥ १२ ॥ व्याख्या—यक्षके अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र वहीं खड़े रहे, अग्नि-वायुकी भाँति वहाँसे लौटे नहीं। इतनेमे ही उन्होंने देखा कि जहाँ दिव्य यक्ष था, ठीक उसी जगह अत्यन्त शोभामयी हिमाचलकुमारी उमादेवी प्रकट हो गयी हैं। उन्हें देखकर इन्द्र उनके पास चले गये । इन्द्रपर कृपा करके करुणामय परब्रह्म पुरुषोत्तमने ही उमारूपा साक्षात् ब्रह्मविद्याको प्रकट किया था । इन्द्रने भक्तिपूर्वक उनसे कहा—'भगवती ! आप सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वर श्रीशङ्करकी स्वरूपा-शक्ति हैं । अतः आपको अवश्य ही सब बातोका पता है । कृपापूर्वक मुझे बतलाइये कि यह दिव्य यक्ष, जो दर्शन देकर तुरत ही छिप गया, वस्तुतः कौन है और किस हेतुसे यहाँ प्रकट हुआ था' ॥ १२ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ❖ चतुर्थ खण्ड सा ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति, ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥१॥ सा = उस ( भगवती उमा देवी ) ने; ह उवाच = स्पष्ट उत्तर दिया कि; ब्रह्म इति = ( वे तो ) परब्रह्म परमात्मा हैं, ब्रह्मणः वै = उन परमात्माकी ही; एतद्विजये = इस विजयमे; महीयध्वम् इति = तुम अपनी महिमा मानने लगे थे ततः एव = उमाके इस कथनसे ही, ह = निश्चयपूर्वक; विदाञ्चकार = ( इन्द्रने ) समझ लिया ( कि ); ब्रह्म इति = ( यह ) ब्रह्म है ॥ १ ॥ व्याख्या—देवराज इन्द्रके पूछनेपर भगवती उमादेवीने इन्द्रसे कहा कि तुम जिन दिव्य यक्षको देख रहे थे और जो इस समय अन्तर्धान हो गये हैं, वे साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं । तुमलोगोंने जो असुरोंपर विजय प्राप्त की है, यह उन ब्रह्मकी शक्तिसे ही की है; अतएव वस्तुतः यह उन परब्रह्मकी ही विजय है । तुम तो इसमें निमित्तमात्र थे । परंतु तुमलोगोंने ब्रह्मकी इस विजयको अपनी विजय मान लिया और उनकी महिमाको अपनी महिमा समझने लगे । यह तुम्हारा मिथ्याभिमान था और जिन परम कारुणिक परमात्माने तुमलोगोंपर कृपा करके असुरोंपर तुम्हें विजय प्रदान करायी, उन्हीं परमात्माने तुम्हारे मिथ्याभिमानका नाश करके तुम्हारा कल्याण करनेके लिये यक्षके रूपमें प्रकट होकर अग्नि और वायुका गर्व चूर्ण किया एव तुम्हें वास्तविक ज्ञान देनेके लिये मुझे प्रेरित किया। अतएव तुम अपनी स्वतन्त्र शक्तिके सारे अभिमानका त्याग करके, जिन ब्रह्मकी महिमासे महिमान्वित और शक्तिमान् बने हो, उन्हींकी महिमा समझो । स्वप्नमें भी यह भावना मत करो कि ब्रह्मकी शक्तिके बिना अपनी स्वतन्त्र शक्तिसे कोई भी कुछ कर सकता है । उमाके इस उत्तरसे देवताओंमें सबसे पहले इन्द्रको यह निश्चय हुआ कि यक्षके रूपमें स्वयं ब्रह्म ही उन लोगोंके सामने प्रकट हुए थे ॥ १ ॥ तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत् विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥ तस्मात् वै = इसीलिये, एते देवाः = ये तीनों देवता, यत् = जो कि, अग्निः = अग्नि, वायुः = वायु ( और ), इन्द्रः = इन्द्रके नामसे प्रसिद्ध हैं, अन्यान् = दूसरे ( चन्द्रमा आदि ), देवान् = देवोंकी अपेक्षा, अतितराम् इव = मानो अतिशय श्रेष्ठ हैं, हि = क्योंकि, ते = उन्होंने ही; एनत् नेदिष्ठम् = इन अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको, पस्पृशुः = ( दर्शनद्वारा ) स्पर्श किया है, ते हि = ( और ) उन्होंने ही; एनत् = इनको, प्रथमं = सबसे पहले, विदाञ्चकार = जाना है ( कि )' ब्रह्म इति = ये साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ २ ॥