कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 187, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 187
- ईशावास्योपनिषद् * १७१ अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥ १८ ॥ अग्ने=हे अग्निके अधिष्ठातृ देवता !, अस्मान्=हमें, राये=परम धनरूप परमेश्वरकी सेवामें पहुँचानेके लिये; सुपथा= सुन्दर शुभ ( उत्तरायण ) मार्गसे; नय=(आप) ले चलिये, देव=हे देव; ( आप हमारे ) विश्वानि=सम्पूर्ण, वयुनानि= कर्मोंको; विद्वान्=जाननेवाले हैं; ( अत' ) अस्मत्=हमारे, जुहुराणम्=इस मार्गके प्रतिबन्धक, एन:= ( यदि कोई ) पाप हैं ( तो उन सबको ); युयोधि=( आप ) दूर कर दीजिये; ते=आपको, भूयिष्ठाम्=वार-वार; नमउक्तिम्= नमस्कारके वचन; विधेम=( हम ) कहते हैं—वार-वार नमस्कार करते हैं ॥ १८ ॥ व्याख्या—साधक कहता है—हे अग्निदेवता ! मैं अब अपने परम प्रभु भगवान्की सेवामें पहुँचना और सदाके लिये उन्हींकी सेवामे रहना चाहता हूँ । आप शीघ्र ही मुझे परम सुन्दर मङ्गलमय उत्तरायणमार्गसे भगवान्के परमधाममें पहुँचा दीजिये । आप मेरे कर्मोंको जानते हैं। मैंने जीवनमे भगवान्की भक्ति की है और उनकी कृपासे इस समय भी मैं ध्याननेत्रोंसे उनके दिव्य स्वरूपके दर्शन और उनके नामोंका उच्चारण कर रहा हूँ । मेरा अधिकार है कि मैं इसी मार्गसे जाऊँ । तथापि यदि आपके ध्यानमें मेरा कोई ऐसा कर्म शेष हो, जो इस मार्गमें प्रतिबन्धकरूप हो, तो आप कृपा करके उसे नष्ट कर दीजिये । मैं आपको बार-बार विनयपूर्वक नमस्कार करता हूँ *-† ॥ १८ ॥ ॥ यजुर्वेदीय ईशावास्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है ।
- इस मन्त्रका भावार्थ एक सज्जन इस प्रकार करते हैं— हे सबके अग्रणी ( जगद्गुरो ) ! तू हमें धनके लिये—लोक और परलोकके सुखके लिये- नेकीके रास्तेसे चला । हे सबके अन्तर्यामी प्रकाशमान ' तू हमारे सब ज्ञानोंको जाननेवाला है । हमसे अच्छे मार्गमें बाधा देनेवाले कुटिल पापको दूर कर । हम तुझे बार-बार नमस्कार करते हैं । † इस उपनिषद्का पन्द्रहवाँ और सोलहवाँ मन्त्र सबके लिये मननीय हैं । उन मन्त्रोंके भावके अनुसार सबको भगवान्से दर्शन देनेके लिये प्रार्थना करनी चाहिये । 'सत्यधर्माय दृष्टये' का यह भाव भी समझना चाहिये कि 'भगवन् ! आप अपने स्वरूपका वह आवरण—वह परदा हटा दीजिये, जिससे सत्यधर्मरूप आप परमेश्वरकी प्राप्ति तथा आपके मङ्गलमय श्रीविग्रहका दर्शन हो सके । इसी प्रकार सत्रहवें और अठारहवें मन्त्रके भावका भी प्रत्येक मनुष्यको विशेषत मुमूर्षु अवस्थामें अवश्य स्मरण करना चाहिये । इन मन्त्रोंके अनुसार अन्तकालमें भगवान्की प्रार्थना करनेसे मनुष्यमात्रका कल्याण हो सकता है । भगवान्ने स्वयं भी गीतामें कहा है—'अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । य प्रयाति स मद्भाव याति नास्त्यत्र सशय ॥' मुमूर्षुमात्रके लाभके लिये इन दो मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है—'हे परमात्मन् ! मेरे ये इन्द्रिय और प्राण आदि अपने-अपने कारण-तत्त्वोंमें लीन हो जायँ और मेरा यह स्थूल शरीर भी भस्म हो जाय । इनके प्रति मेरे मनमें किञ्चित् भी आसक्ति न रहे । हे यज्ञमय विष्णो ! आप कृपा करके मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण करें । आपके स्मरण कर लेनेसे मैं और मेरे कर्म सब पवित्र हो जायँगे । फिर तो मै अवश्य ही आपके चरणोंकी सेवामें पहुँच जाऊँगा ॥ १७ ॥ हे अग्निरूप परमेश्वर ! आप ही मेरे धन हैं—सर्वस्व हैं, अतः आपकी ही प्राप्तिके लिये आप मुझे उत्तम मार्गसे अपने चरणोंके समीप पहुँचाइये । मेरे जितने भी शुभाशुभ कर्म हैं, वे आपसे छिपे नहीं हैं, आप सबको जानते हैं, मैं उन कर्मोंके बलपर आपको नहीं पा सकता, आप स्वयं ही दया करके मुझे अपना लीजिये । आपकी प्राप्तिमें जो भी प्रतिबन्धक पाप हों उन सबको आप दूर कर दें; मैं वारवार आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १८ ॥'