भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 832 में से

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पृष्ठ 186

१७० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जाते हैं, आप प्रजापतिके भी प्रिय हैं। हे प्रभो ! इस सूर्यमण्डलकी तप्त रश्मियोंको एकत्र करके अपनेमें लुप्त कर लीजिये। इसके उग्र तेजको समेटकर अपनेमें मिला लीजिये और मुझे अपने दिव्यस्वरूपके प्रत्यक्ष दर्शन कराइये। अभी तो मैं आपकी कृपासे आपके सौन्दर्य-माधुर्य-निधि दिव्य परम कल्याणरूप सच्चिदानन्दस्वरूपका ध्यान दृष्टिसे दर्शन कर रहा हूँ, साथ ही बुद्धिके द्वारा समझ भी रहा हूँ कि वही आप परम पुरुष इस सूर्यके और समस्त विश्वके आत्मा हैं। अतः आपके लिये जो वह सूर्यमण्डलस्थ पुरुष है, वही मैं भी हूँ। उस पुरुषमें और मुझमें किसी प्रकारका भेद नहीं है * ॥ १६ ॥ सम्बन्ध-ध्यानके द्वारा भगवान्‌के दिव्य मङ्गलमय स्वरूपके दर्शन करता हुआ साधक अब भगवान्‌की साक्षात् सेवामें पहुँचनेके लिये व्यग्र हो रहा है और शरीरका त्याग करते समय सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरके सर्वथा विघटनकी भावना करता हुआ भगवान्‌से प्रार्थना करता है- वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त ँ शरीरम् । ॐ क्रतो स्मर कृत ँ स्मर क्रतो स्मर कृत ँ स्मर ॥ १७ ॥ अथ = अब, वायुः = ये प्राण और इन्द्रियाँ, अमृतम् = अविनाशी; अनिलम् = समष्टि वायु-तत्त्वमे; ( प्रविशतु = प्रविष्ट हो जायँ, ) इदम् = यह, शरीरम् = स्थूल शरीर; भस्मान्तम् = अग्निमे जलकर भस्मरूप, ( भूयात् = हो जाय; ) ॐ = हे सच्चिदानन्दघन; क्रतो = यज्ञमय भगवन्, स्मर = ( आप मुझ भक्तको ) स्मरण करें; कृतम् = मेरे द्वारा किये हुए कर्मोंका; स्मर = स्मरण करें; क्रतो = हे यज्ञमय भगवन्; स्मर = ( आप मुझ भक्तको ) स्मरण करें; कृतम् = ( मेरे ) कर्मोंको, स्मर = स्मरण करें ॥ १७ ॥ व्याख्या-परमधामका यात्री वह साधक अपने प्राण, इन्द्रिय और शरीरको अपनेसे सर्वथा भिन्न समझकर उन सबको उनके अपने-अपने उपादान तत्त्वोंमे सदाके लिये विलीन करना एव सूक्ष्म और स्थूल शरीरका सर्वथा विघटन करना चाहता है। इसलिये कहता है कि प्राणादि समष्टिवायु आदिमे प्रविष्ट हो जायँ और स्थूल शरीर जलकर भस्म हो जाय । फिर वह अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीभगवान्‌से प्रार्थना करता है कि हे यज्ञमय विष्णु-सच्चिदानन्द विज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! आप अपने निजजन मुझको और मेरे कर्मोंको स्मरण कीजिये। आप स्वभावसे ही मेरा और मेरे द्वारा बने हुए भक्तिरूप कार्योंका स्मरण करेंगे; क्योंकि आपने कहा है, 'अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमा गतिम्'-मैं अपने भक्तका स्मरण करता हूँ और उसे परम गतिमें पहुँचा देता हूँ, अपनी सेवामे स्वीकार कर लेता हूँ; क्योंकि यही सर्वश्रेष्ठ गति है। इसी अभिप्रायसे भक्त यहाँ दूसरी बार फिर कहता है कि भगवन् ! आप मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण कीजिये । अन्तकालमें मैं आपकी स्मृतिमें आ गया तो फिर निश्चय ही आपकी सेवामे शीघ्र पहुँच जाऊँगा † ॥ १७ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार अपने आराध्यदेव परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्‌से प्रार्थना करके अब साधक अपुनरावर्ती अर्चि आदि मार्गके द्वारा परम धाममें जाते समय उस मार्गके अग्नि-अभिमानी देवतासे प्रार्थना करता है-

  • एक आदरणीय विद्वान्‌ने १६ वें मन्त्रका यह अर्थ किया है- हे जगत्‌का पोषण करनेवाले पूषन् ! अकेले विचरण करनेवाले एकर्षे ! सबका नियमन करनेवाले यम ! प्राण और रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य ! प्रजापति-पुत्र प्राजापत्य ! अपनी किरणोंको हटा लो, अपने तेजको समेट लो। तुम्हारा जो परम कल्याणमय और अत्यन्त शोभन स्वरूप है, उसे तुम आत्माकी कृपासे मै देखता हूँ। तथा यह मै तुममे सेवककी भाँति याचना नहीं करता, क्योकि यह जो व्याहृतिरूप अङ्गोंवाला आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है-जो पुरुषाकार होनेसे अथवा जो प्राण और बुद्धिरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को पूर्ण किये हुए है या जो शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष है-वह मै ही हू ॥ १६ ॥ अनुसार... समय जो मेरा स्मरणीय है, उसका स्मरण कर, अब यह उसका समय उपस्थित हो गया है, अत तू स्मरण कर। 'क्रतो स्मर कृत स्मर'का पुनरुक्ति यहाँ आदरके लिये है।