कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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- ईशावास्योपनिषद् * १६९ यात्रा सुखपूर्वक चलती है,* और उसके आभ्यन्तरिक विकारोंका नाश होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है एवं भगवत्कृपासे वह सहज ही मृत्युमय संसार-सागरको तर जाता है। विनाशशील देवता आदिकी निष्काम उपासनाके साथ-ही-साथ अविनाशी परात्पर प्रभुकी उपासनासे वह शीघ्र ही अमृतरूप परमेश्वरको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है † ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—श्रीपरमेश्वरकी उपासना करनेवालोंको परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, यह कहा गया है। अत भगवान्के भक्तको अन्तकालमें परमेश्वरसे उनकी प्राप्तिके लिये किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं— हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ पूषन्=हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर; सत्यस्य = सत्यस्वरूप आप सर्वेश्वरका, मुखम् = श्रीमुख, हिरण्मयेन = ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलखरूप; पात्रेण = पात्रसे, अपिहितम् = ढका हुआ है; सत्यधर्माय = आपकी भक्तिरूप सत्य- धर्मका अनुष्ठान करनेवाले मुझको; दृष्टये = अपने दर्शन करानेके लिये; तत् =उस आवरणको, त्वम् = आप, अपावृणु = हटा लीजिये ॥ १५ ॥ व्याख्या—भक्त इस प्रकार प्रार्थना करे कि हे भगवन् ! आप अखिल ब्रह्माण्डके पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्य धर्म है और मैं उसमें लगा हुआ हूँ; अतएव मेरी पुष्टि—मेरे मनोरथकी पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। आपका दिव्य श्रीमुख—सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय सूर्यमण्डलसे चमचमाती हुई ज्योतिर्मयी यवनिकासे आवृत्त है। मैं आपका निरावरण प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ, अतएव आपके पास पहुँचकर आपका निरावरण दर्शन करनेमें बाधा देनेवाले जितने भी, जो भी आवरण—प्रतिबन्धक हों, उन सबको मेरे लिये आप हटा लीजिये ! अपने सच्चिदानन्दस्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट कीजिये ‡ ॥ १५ ॥ पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह। तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥ पूषन् = हे भक्तोंका पोषण करनेवाले; एकर्षे = हे मुख्य ज्ञानस्वरूप, यम = हे सबके नियन्ता; सूर्य = हे भक्तो या ज्ञानियों (सूरियों) के परम लक्ष्यरूप, प्राजापत्य = हे प्रजापतिके प्रिय; रश्मीन् = इन रश्मियोंको; व्यूह = एकत्र कीजिये या हटा लीजिये; तेजः = इस तेजको, समूह = समेट लीजिये या अपने तेजमें मिला लीजिये; यत् = जो, ते = आपका, कल्याणतमम् = अतिशय कल्याणमय; रूपम् = दिव्य स्वरूप है, तत् =उस, ते = आपके दिव्य स्वरूपको, पश्यामि = मैं आपकी कृपासे ध्यानके द्वारा देख रहा हूँ, यः = जो; असौ = वह (सूर्यका आत्मा) है; असौ = वह, पुरुषः = परम पुरुष (आपका ही स्वरूप है), अहम् = मैं (भी), सः अस्मि = वही हूँ ॥ १६ ॥ व्याख्या—भगवन् ! आप अपनी सहज कृपासे भक्तोंके भक्ति-साधनमे पुष्टि प्रदान करके उनका पोषण करनेवाले हैं, आप समस्त ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, परम ज्ञानस्वरूप तथा अपने भक्तोंको अपने स्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं (गीता १० । १२); आप सबका यथायोग्य नियमन, नियन्त्रण और शासन करनेवाले हैं; आप ही भक्तों या ज्ञानी महापुरुषोंके लक्ष्य हैं और अविज्ञेय होनेपर भी अपने भक्तवत्सल स्वभावके कारण भक्तिके द्वारा उनके जाननेमें आ
- कई आदरणीय महानुभावोंने असम्भूतिका अर्थ 'अव्याकृत प्रकृति' और सम्भूतिका अर्थ 'कार्यब्रह्म' किया है। एवं कहा है कि कार्यब्रह्मकी उपासनामे अधर्म तथा कामनादि दोषजनित अनैश्वर्यरूप मृत्युको पार करके, हिरण्यगर्भकी उपासनासे अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्तिरूप फल मिलना है। अतएव उससे अनैश्वर्य आदि मृत्युको पार करके इम अव्यक्तोपासनामे प्रकृतिलयरूप अमृत प्राप्त कर लेना है। † कुछ अन्य महानुभावोंने असम्भूतिका अर्थ 'महाएकता' और सम्भूतिका 'सृष्टिकर्त्ता' माना है। ‡ एक महानुभावने इस मन्त्रका यह अर्थ किया है— हे पूर्ण परमात्मन् ! सोनेके ढकनेमे (सोनेके समान मन-लुभावने विषयरूपी मायाके परदेमे) तुझ सत्यका मुख ढका हुआ है अर्थात् हम विषयोंमे फँसे हुए हैं। हे सबके पोषक ! उस ढकनेको मुझ सत्य-परायण साधकके लिये तू उठा दे, जिससे मैं दर्शन कर सकूँ। उ० अ० २२—