भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

१६८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥ सम्भवात् = अविनाशी ब्रह्मकी उपासनासे, अन्यत् एव = दूसरा ही फल; आहुः = बतलाते हैं; (और) असम्भवात् = विनाशशील देव पितरादिकी उपासनासे, अन्यत् = दूसरा (ही) फल, आहुः = बतलाते हैं; इति = इस प्रकार; (हमने) धीराणाम् = (उन) धीर पुरुषोंके, शुश्रुम = वचन सुने हैं; ये = जिन्होंने, नः = हमें; तत् = उस विषयको, विचचक्षिरे = व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १३ ॥ व्याख्या-अविनाशी ब्रह्मकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्‌को सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सर्वमय, सम्पूर्ण संसारके कर्ता, धर्ता, हर्ता, नित्य अविनाशी समझना और भक्ति श्रद्धा तथा प्रेमपरिपूरित हृदयसे नित्य-निरन्तर उनके दिव्य परम मधुर नाम, रूप, लीला, धाम तथा प्राकृत गुणरहित एव दिव्य गुणगणमय सच्चिदानन्द- घन स्वरूपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करते रहना । इस प्रकारकी सच्ची उपासनासे उपासकको शीघ्र ही अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्ति हो जाती है (गीता ९।३४)। ईश्वरोपासनाका मिथ्या स्वाँग भरनेवाले दम्भियों- को जो फल मिलता है, उससे इन सच्चे उपासकोंको मिलनेवाला यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है । इसी प्रकार विनाशी देवता आदिकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-शास्त्रोंके एव श्रीभगवान्‌के आज्ञानुसार (गीता १७।१४) देवता, पितर, ब्राह्मण, माता-पिता, आचार्य और ज्ञानी महापुरुषोंकी अवश्यकर्त्तव्य समझकर सेवा- पूजादि करना और उसको भगवान्‌की आज्ञाका पालन एव उनकी परम सेवा समझना। इस प्रकार निष्कामभावसे अन्य देवताओंकी सेवा-पूजा करनेवालोंके अन्तःकरणकी शुद्धि होती है तथा श्रीभगवान्‌की कृपा एव प्रसन्नता प्राप्त होती है, जिससे वे मृत्युमय संसारसागरसे तर जाते हैं। विनाशशील देवता आदिकी सकाम उपासनामे जो फल मिलता है, उससे यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है । इस प्रकार हमने उन धीर तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंमे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक् पृथक् रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १३ ॥ सम्बन्ध - अब उपर्युक्त प्रकारसे सम्भूति और असम्भूति दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट बतलाते हैं- सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ यः = जो मनुष्य; तत् उभयम् = उन दोनोंको; (अर्थात्) सम्भूतिम् = अविनाशी परमेश्वरको; च = और; विनाशम् = विनाशशील देवादिको, च = भी, सह = साथ-साथ; वेद = यथार्थतः जान लेता है; विनाशेन = (वह) विनाशशील देवादिकी उपासनासे, मृत्युम् = मृत्युको, तीर्त्वा = पार करके; सम्भूत्या = अविनाशी परमेश्वरकी उपासनासे, अमृतम् = अमृत- को, अश्नुते = भोग करता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥ व्याख्या-जो मनुष्य यह समझ लेता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम नित्य अविनाशी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वाधिपति, सर्वात्मा और सर्वश्रेष्ठ है, वे परमेश्वर नित्य निर्गुण (प्राकृत गुणोंसे सर्वथा रहित) और नित्य सगुण (स्वरूप- भूत दिव्यकल्याणगुणगणविभूषित) हैं। और इसीके साथ जो यह भी समझ लेता है कि देवता, पितर, मनुष्य आदि जितनी भी योनियाँ तथा भोगसामग्रियाँ हैं, सभी विनाशशील, क्षणभङ्गुर और जन्म-मृत्युशील होनेके कारण महान् दुःखकी कारण हैं; तथापि इनमें जो सत्ता-स्फूर्ति तथा शक्ति है, वह सभी भगवान्‌की है और भगवान्‌के जगच्चक्रके सुचारुरूपसे चलते रहनेके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ ही इनकी यथास्थान यथायोग्य सेवा पूजा आदि करनेकी शास्त्रोंने आज्ञा दी है और शास्त्र भगवान्‌की ही वाणी है। वह मनुष्य इहलौकिक तथा पारलौकिक देव पितरादि लोकोंके भोगोंमे आसक्त न होकर कामना-ममता आदिको हृदयसे निकालकर इन सबकी यथायोग्य शास्त्रविहित सेवा-पूजादि करता है। इससे उसकी जीवन-