कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ `नो निषद् यह उपनिषद् सामवेदके ‘तलवकार ब्राह्मण’ के अन्तर्गत है। तलवकारको जैमिनीय उपनिषद् भी कहते हैं। ‘तलवकार ब्राह्मण’ के अस्तित्वके सम्बन्धमे कुछ पाश्चात्त्य विद्वानोंको सन्देह हो गया था, परन्तु डा० बर्नलको कहींसे एक प्राचीन प्रति मिल गयी, तबसे वह सन्देह जाता रहा। इस उपनिषद्में सबसे पहले ‘केन’ शब्द आया है, इसीसे इसका ‘केनोपनिषद्’ नाम पड़ गया। इसे ‘तलवकार उपनिषद्’ और ‘ब्राह्मणोपनिषद्’ भी कहते हैं। तलवकार ब्राह्मणका यह नवम अध्याय है। इसके पूर्वके आठ अध्यायोंमें अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये विभिन्न कर्म और उपासनाओंका वर्णन है। इस उपनिषद्का प्रतिपाद्य विषय परब्रह्म- तत्त्व बहुत ही गहन है, अतएव उसको भलीभाँति समझानेके लिये गुरु-शिष्य-संवादके रूपमे तत्त्वका विवेचन किया गया है। शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ=हे परब्रह्म परमात्मन्, मम=मेरे, अङ्गानि=सम्पूर्ण अङ्ग, वाक्=वाणी; प्राणः=प्राण, चक्षुः=नेत्र, श्रोत्रम्=कान, च= और, सर्वाणि=सब, इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ, अथो=तथा, बलम्=शक्ति, आप्यायन्तु=परिपृष्ट हों, सर्वम्=(यह जो) सर्वरूप; औपनिषदम्=उपनिषद्-प्रतिपादित; ब्रह्म=ब्रह्म है, अहम्=मैं; ब्रह्म=इस ब्रह्मको, मा निराकुर्याम्=अस्वीकार न करूँ; (और) ब्रह्म=ब्रह्म, मा=मुझको, मा निराकरोत्=परित्याग न करे, अनिराकरणम्=(उसके साथ मेरा) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो, मे=मेरे साथ; अनिराकरणम्=(उसका) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो, उपनिषत्सु=उपनिषदोंमें प्रतिपादित; ये=जो, धर्माः=धर्मसमूह हैं, ते=वे सब, तदात्मनि=उस परमात्मामें, निरते=लगे हुए, मयि=मुझमें; सन्तु=हों, ते=वे सब, मयि=मुझमें, सन्तु=हों। ॐ=हे परमात्मन्; शान्तिः शान्तिः शान्तिः=त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो। व्याख्या—हे परमात्मन् ! मेरे सारे अङ्ग, वाणी, नेत्र श्रोत्र आदि सभी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणसमूह, शारीरिक और मानसिक शक्ति तथा ओज—सब पुष्टि एव वृद्धिको प्राप्त हों। उपनिषदोंमें सर्वरूप ब्रह्मका जो स्वरूप वर्णित है, उसे मैं कभी अस्वीकार न करूँ और वह ब्रह्म भी मेरा कभी प्रत्याख्यान न करे। मुझे सदा अपनाये रक्खे। मेरे साथ ब्रह्मका और ब्रह्मके साथ मेरा नित्य सम्बन्ध बना रहे। उपनिषदोंमे जिन धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, वे सारे धर्म, उपनिषदोंके एकमात्र लक्ष्य परब्रह्म परमात्मामें निरन्तर लगे हुए मुझ साधकमें सदा प्रकाशित रहें, मुझमे नित्य निरन्तर बने रहें। और मेरे त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो। सम्बन्ध—शिष्य गुरुदेवसे पूछता है— ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ केन=किसके द्वारा, इषितम्=सत्ता-स्फूर्ति पाकर, (और) प्रेषितम्=प्रेरित—सञ्चालित होकर (यह), मनः=मन (अन्तःकरण), पतति=अपने विषयोंमें गिरता है—उनतक पहुँचता है, केन=किसके द्वारा, युक्तः=नियुक्त होकर; प्रथमः=अन्य सबसे श्रेष्ठ, प्राणः=प्राण, प्रैति=चलता है, केन=किसके द्वारा, इषिताम्=क्रियाशील की हुई; इमाम्=इस;