कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * खड़ा देखकर यक्षने पूछा—'आप कौन हैं?' वायुने भी अपने गुण गौरवके गर्वसे तमककर उत्तर दिया 'मै प्रसिद्ध वायु हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम मातरिश्वा है' ॥ ८ ॥ सम्बन्ध—यक्षरूपी ब्रह्मने वायुसे पूछा— तस्मिँ२स्त्वयि किं वीर्यमिति ? अपीदँ२ सर्वमाददीयम्, यदिदं पृथिव्यामिति ॥९॥ तस्मिन् त्वयि = उक्त नामोंवाले तुझ वायुमे; किं वीर्यम् = क्या सामर्थ्य है; इति = यह बता; (तत्र वायुने यह उत्तर दिया कि ) अपि = यदि ( मैं चाहूँ तो), पृथिव्याम् = पृथ्वीमें, यत् इदम् = यह जो कुछ भी है; इदम् सर्वम् = इस सबको; आददीयम् इति = उठा लूँ-आकाशमें उड़ा दूँ ॥ ९ ॥ व्याख्या—वायुकी भी वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर ब्रह्मने इनसे भी वैसे ही अनजानकी भाँति कहा—'अच्छा ! आप वायुदेवता हैं और मातरिश्वा—अन्तरिक्षमें विना ही आधारके विचरण करनेवाले भी आप ही हैं ! बड़ी अच्छी बात है ! पर यह तो बताइये कि आपमें क्या शक्ति है—आप क्या कर सकते हैं ?' इसपर वायुने भी अग्निकी भाँति ही पुन. सगर्व उत्तर दिया कि 'मैं चाहूँ तो इस सारे भूमण्डलमें जो कुछ भी देखनेमें आ रहा है, सबको बिना आधारके उठा लूँ— उड़ा दूँ' ॥ ९ ॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥ १० ॥ तस्मै = (तब उस दिव्य यक्षने ) उस वायुदेवके सामने, तृणम् = एक तिनका; निदधौ = रख दिया, ( और यह कहा कि) एतत् = इस तिनकेको; आदत्स्व इति = उठा लो-उड़ा दो; सः = वह ( वायु ); सर्वजवेन = पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय = उस तिनकेपर झपटा (परन्तु); तत् = उसको, आदातुम् = उड़ानेमे, न एव शशाक = किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हुआ, ततः = ( तब लज्जित होकर ) वहाँसे, निववृते = लौट गया (और देवताओंसे बोला), एतत् = यह; विज्ञातुम् = जाननेमें, न अशकम् = मैं समर्थ नहीं हो सका ( कि वस्तुतः); एतत् = यह, यक्षम् = दिव्य यक्ष, यत् इति = कौन है ॥ १० ॥ व्याख्या—वायुदेवताकी भी पुन: वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ता-शक्ति देनेवाले परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे भी एक सूखा तिनका डालकर कहा—'आप तो सभीको उड़ा सकते हैं, तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको उड़ा दीजिये ।' वायुदेवताने भी मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे, उसे उड़ाना चाहा, जब नहीं उड़ा तो उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी । परन्तु शक्तिमान् परमात्माके द्वारा शक्ति रोक लिये जानेके कारण वे उसे तनिक-सा हिला भी नहीं सके और अग्निकी ही भाँति हतप्रतिष्ठ और हतप्रभ होकर लज्जासे सिर झुकाये वहाँसे लौट आये एव देवताओंसे बोले कि 'मैं तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है ।' ॥ १० ॥ अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति । तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे ॥ ११ ॥ अथ = तदनन्तर, इन्द्रम् = इन्द्रसे; अब्रुवन् = (देवताओंने) यह कहा; मघवन् = हे इन्द्रदेव; एतत् = इस बातको; विजानीहि = आप जानिये—भलीभाँति पता लगाइये (कि); एतत् = यह; यक्षम् = दिव्य यक्ष; किम् इति = कौन है; (तब इन्द्रने यह कहा ) तथा इति = बहुत अच्छा, तत् अभ्यद्रवत् = (और वे ) उस यक्षकी ओर दौड़कर गये (परन्तु वह दिव्य यक्ष ), तस्मात् = उनके सामनेसे, तिरोदधे = अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥ व्याख्या—जब अग्नि और वायु-सरीखे अप्रतिम शक्ति और बुद्धिसम्पन्न देवता असफल होकर लौट आये और उन्होंने कोई कारण भी नहीं बताया, तब देवताओंने विचार करके स्वय देवराज इन्द्रको इस कार्यके लिये चुना और उन्होंने कहा—'हे महान् बलशाली देवराज ! अब आप ही जाकर पूरा पता लगाइये कि यह यक्ष कौन है । आपके सिवा अन्य किसीसे इस काममे सफल होनेकी सम्भावना नही है ।' इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर तुरत यक्षके पास गये, पर उनके वहाँ पहुँचते ही वह उनके सामनेसे अन्तर्धान हो गया । इन्द्रमे इन देवताओंसे अधिक अभिमान था; इसलिये ब्रह्मने उनको